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संपादकीय: महंगाई की रफ्तार

अप्रैल-मई का महीना खाने-पीने की वस्तुओं के लिहाज से बहुत महंगा नहीं माना जाता, क्योंकि इस मौसम में गेहूं, आलू, प्याज, दालों आदि की बाजार में आवक भरपूर रहती है। सब्जी, खाद्य तेल आदि के मामले में भी किसी तरह की किल्लत नहीं होती।

Author Published on: June 14, 2019 1:10 AM
पिछले कुछ समय से डीजल और पेट्रोल की कीमतें लगातार बढ़ी हैं।

मुद्रास्फीति के ताजा अंकड़ों में खाने-पीने की वस्तुओं में महंगाई की दर कुछ बढ़ी हुई दर्ज हुई है। मई महीने में बढ़ कर यह 3.05 फीसद पर पहुंच गई। यह आंकड़ा केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय की तरफ से जारी किया गया है। पिछले सात महीनों में इसे सबसे ऊंची दर बताया जा रहा है। अप्रैल में खुदरा वस्तुओं में महंगाई की दर 2.99 फीसद थी, जिसके नीचे गिर कर 2.92 फीसद पर रहने का अनुमान लगाया गया था। मगर वह अनुमान विफल हुआ। खुदरा वस्तुओं में मुद्रास्फीति बढ़ने से आम लोगों को खाने-पीने की वस्तुओं पर अधिक खर्च करना पड़ता है। स्वाभाविक ही इससे न सिर्फ लोगों की जेबों, बल्कि बाजार पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है। मगर पिछले साल की इसी अवधि में मुद्रास्फीति की दर को देखें, तो यह 4.87 थी। उसके बाद पिछले साल अक्तूबर में यह दर घट कर 3.38 फीसद पर पहुंच गई थी। इससे तुलना करें, तो पिछले महीने की खुदरा मुद्रास्फीति दर में वृद्धि को चिंताजनक नहीं कहा जा सकता। मगर सरकार जिस तरह महंगाई की दर पर काबू पाने को लेकर गंभीर है, उसमें यह वृद्धि उसे सोचने पर विवश जरूर करती है।

अप्रैल-मई का महीना खाने-पीने की वस्तुओं के लिहाज से बहुत महंगा नहीं माना जाता, क्योंकि इस मौसम में गेहूं, आलू, प्याज, दालों आदि की बाजार में आवक भरपूर रहती है। सब्जी, खाद्य तेल आदि के मामले में भी किसी तरह की किल्लत नहीं होती। पिछले दो महीनों में मौसम भी खराब नहीं रहा, जिससे कि फसलों पर बुरा असर पड़ा हो। ऐसे में महंगाई की दर कुछ बढ़ी हुई दर्ज हुई है, तो चिंता की बात कही जा सकती है। मगर इसकी कुछ वजहें भी समझी जा सकती हैं। पिछले कुछ समय से डीजल और पेट्रोल की कीमतें लगातार बढ़ी हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़त पर है। फिर ईरान से तेल न खरीद पाने की अमेरिकी बंदिश भी है। सरकार ने कुछ महीने से तेल की कीमतों में वृद्धि को लेकर जो हाथ रोक रखा था, उसे चुनाव बाद खोल दिया है। जाहिर है, जब तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो उसका असर माल ढुलाई पर पड़ता है और जब माल ढुलाई का किराया बढ़ता है, तो उसका असर खुदरा वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है। मुद्रास्फीति के ताजा अंकड़ों के पीछे यह एक बड़ा कारण माना जा सकता है।

हालांकि महंगाई की दर केवल फसलों की आवक, डीजल-पेट्रोल की कीमतों पर निर्भर नहीं होती। इसमें लोगों की क्रयशक्ति, बाजार में पूंजी का प्रवाह आदि तत्त्व भी काम करते हैं। छिपी बात नहीं है कि कुछ समय से इन दोनों पहलुओं पर स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। इसीलिए केंद्रीय बैंक ने इस महीने अपनी मौद्रिक नीति में बदलाव करते हुए रेपो दर में पच्चीस आधार अंक की कटौती की। निश्चय ही खुदरा बाजार पर भी इसका सकारात्मक असर नजर आएगा। फिर खेतों से बाजार तक वस्तुओं की समुचित पहुंच न हो पाने से भी खुदरा बाजार की कीमतों में असंतुलन पैदा होता है। कई बार देखा जाता है कि एक ही वस्तु की कीमत में ग्रामीण और शहरी बाजार में भारी अंतर होता है। यह सिर्फ ढुलाई की कीमत बढ़ने की वजह से नहीं, बल्कि कृषि उत्पाद के विपणन की उचित व्यवस्था न होने के कारण भी होता है। महंगाई की दर पर काबू पाने के लिए कृषि उत्पाद की बाजार तक सही ढंग से पहुंच बनाने और भंडारण आदि की सुविधाओं पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत होती है।

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