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संचार की सीमा

पिछले दो-ढाई दशकों के दौरान आधुनिक तकनीकी के तेज विकास ने अमूमन हर क्षेत्र को प्रभावित किया है और इसने आम जनजीवन को सहज बनाया है। यों भी, विज्ञान की इस भूमिका ने दुनिया भर के समाजों की जीवन-पद्धतियों में क्रांतिकारी बदलाव किया। लेकिन इसके साथ ही समाज में ही मौजूद कुछ समूहों ने तकनीकों को अपने स्वार्थ में संचालित करना शुरू कर दिया और उसका भी सीधा असर सामान्य जन-जीवन पर पड़ा, कई बार तो बेहद गंभीर दुष्परिणामों की शक्ल में।

Author Published on: December 26, 2018 3:13 AM
तस्‍वीर का इस्‍तेमाल केवल प्रस्‍तुतिकरण के लिए गया है।

पिछले दो-ढाई दशकों के दौरान आधुनिक तकनीकी के तेज विकास ने अमूमन हर क्षेत्र को प्रभावित किया है और इसने आम जनजीवन को सहज बनाया है। यों भी, विज्ञान की इस भूमिका ने दुनिया भर के समाजों की जीवन-पद्धतियों में क्रांतिकारी बदलाव किया। लेकिन इसके साथ ही समाज में ही मौजूद कुछ समूहों ने तकनीकों को अपने स्वार्थ में संचालित करना शुरू कर दिया और उसका भी सीधा असर सामान्य जन-जीवन पर पड़ा, कई बार तो बेहद गंभीर दुष्परिणामों की शक्ल में। इसके बढ़ते नुकसान को देखते हुए आज हालत यह हो गई है कि कई हलकों से इन तकनीकों पर लगाम कसने के स्वर उठने लगे हैं। भारत इससे अछूता नहीं है, जहां संचार के साधन के रूप में सोशल मीडिया ने हाल के कुछ सालों के भीतर अपनी व्यापक पहुंच बना ली है, लेकिन उसके हासिल पर अब चिंता की जाने लगी है। हाल के दिनों में सोशल मीडिया के अलग-अलग मंचों का जिस तरह बेजा इस्तेमाल करने और लगातार भीड़ की हिंसा में लोगों के मारे जाने की खबरें आर्इं, उससे चिंता पैदा होना स्वाभाविक था।

शायद यही वजह है कि अब सरकार ने सोशल मीडिया का दुरुपयोग रोकने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी नियमों में संशोधन का मन बनाया है। इससे संबंधित मसौदे के मुताबिक सोशल मीडिया के मंचों और संदेश सेवा मुहैया कराने वाले एप्स को जांच-पड़ताल की इस तरह की तकनीकी व्यवस्था करनी होगी, जिससे गैरकानूनी सामग्री की पहचान की जा सके और फर्जी संदेशों के प्रसार पर लगाम लगाई जा सके। एक अन्य प्रस्ताव के तहत ऐसे मंचों को किसी तरह की ईशनिंदा, अश्लील, अपमानजनक, नफरत फैलाने वाली या जातीय दृष्टि से आपत्तिजनक सामग्री साझा करने पर लगाम लगाना होगा। दरअसल, पिछले कुछ समय में लगातार ऐसी घटनाएं सामने आर्इं, जिनमें किसी अफवाह के फैलने के बाद लोग भीड़ में तब्दील में हो गए और महज शक के आधार पर किसी व्यक्ति को पीट-पीट कर मार डाला गया। यह अपने आप में एक विद्रूप है कि जिस घटना से पीड़ित का कोई ताल्लुक नहीं हो, उसे सिर्फ अफवाह की वजह से अपनी जान गंवानी पड़ जाए। यह न केवल कानून-व्यवस्था और समाज की सोच पर एक सवालिया निशान है, बल्कि उन तकनीकों के बारे में भी विचार किया जाना चाहिए, जिनके जरिए आज किसी झूठ को आग की तरह फैलाना आसान हो गया है।

गौरतलब है कि आज बहुत सारे लोग संदेशों के आदान-प्रदान के लिए वाट्सऐप या फिर फेसबुक जैसे माध्यमों का भी सहारा लेने लगे हैं। लिखित, श्रव्य या दृश्य सामग्री को आसानी से एक से दूसरे व्यक्ति के पास भेजने के लिहाज से इन माध्यमों का सकारात्मक उपयोग किसी समाज को बेहतर बना सकता है। लेकिन हमारे यहां कई मामलों में इसे किसी अफवाह को फैलाने का जरिया बना लिया जाता है। देश के कई इलाकों से गाय की मौत या फिर बच्चा चोरी की अफवाह फैलने और उसके बाद हुई बेलगाम हिंसा निश्चित रूप से एक बेहद अफसोसनाक स्थिति है। किसी आधुनिक तकनीकी का इस्तेमाल अगर सकारात्मक दिशा में समाज के गुणात्मक विकास के लिए होता है तो इससे बेहतर और क्या होगा! लेकिन अगर यह लोगों या अलग-अलग समुदायों के बीच नफरत और हिंसा फैलाने का जरिया बनता है तो इस पर लगाम लगाना जरूरी है। मगर यह ध्यान रखने की जरूरत है कि इन कवायदों के बीच देश के नागरिकों के निजता के अधिकार सुरक्षित रहें। इसके अलावा, समाज में वैज्ञानिक चेतना के साथ-साथ जातिगत भेदभाव के विरुद्ध समानता के मूल्यों का प्रसार भी बाधित न हो।

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