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संपादकीय: सीवर और सरकार

यह सब तब भी जारी है जब सुप्रीम कोर्ट अपने एक फैसले के जरिए मल, जल, सीवर, सेप्टिक टैंक या नाले की सफाई हाथ से करने पर रोक के बारे में स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी कर चुका है।

Author Published on: September 20, 2019 2:04 AM
सांकेतिक तस्वीर।

इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि देश एक ओर अंतरिक्ष में नित नए प्रयोग और विज्ञान के क्षेत्र में नई ऊंचाइयां हासिल कर रहा है और दूसरी ओर सुरक्षा उपकरणों के बिना बेहद असुरक्षित हालात में साफ-सफाई के काम में लगे लोगों की जान जा रही है। दरअसल, सीवर या बड़े नालों की सफाई के दौरान जहरीली गैसों की चपेट में आकर होने वाली मौतें हमारी तमाम तकनीकी और वैज्ञानिक उपलब्धियों को आईना दिखाती हैं कि अत्याधुनिक तकनीकी का सहारा लेकर कितने भारी और जटिल काम निपटाए जाते हैं, लेकिन इस काम के लिए मजदूरों को मामूली सुरक्षा उपकरण भी मुहैया नहीं कराए जाते।

सरकारी तंत्र के इस रवैये पर सवाल तो लंबे समय से उठते रहे हैं, लेकिन बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले पर जिस तरह की टिप्पणियां की हैं, वे न केवल सरकार के रवैये को, बल्कि हमारे समूचे सामाजिक पूर्वाग्रहों को कठघरे में खड़ा करती हैं। ये अपने आप में शर्मिंदगी भरे हालात हैं कि जिस तरह की गंदगी से बजबजाते नालों के आसपास से फटकना भी लोगों को मुश्किल लगता है, उसमें बिना मास्क और ऑक्सीजन सिलेंडर के कोई इंसान डुबकी लगा कर सफाई करता है और ऐसा करते हुए वह न सिर्फ खतरनाक बीमारियों का शिकार हो सकता है, बल्कि हर वक्त उसकी जान जोखिम में होती है।

इस मामले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने समूचे सरकारी तंत्र के रवैये पर यह तल्ख टिप्पणी की कि दुनिया के किसी भी देश में लोगों को गैस चैंबर में मरने के लिए नहीं भेजा जाता है; इस वजह से हर महीने चार-पांच लोगों की मौत हो जाती है, आप उन्हें मास्क और ऑक्सीजन सिलेंडर क्यों उपलब्ध नहीं कराते? जिस दौर में हर छोटे-मोटे काम तकनीकों पर निर्भर हो गए हैं, उसमें गंदगी और जहरीली गैसों से भरे सीवर में उतरने के वक्त भी किसी मजदूर को मास्क और ऑक्सीजन सिलेंडर मुहैया नहीं कराया जाता है तो यह अभाव का नहीं, लापरवाही या अनदेखी का नतीजा है।

आखिर संबंधित महकमों का आज भी यह रवैया क्यों बना हुआ है? इस पूर्वाग्रह पर भी अदालत ने सवाल उठाया कि देश को आजाद हुए सत्तर साल से भी ज्यादा समय हो गया है, लेकिन हमारे यहां जाति के आधार पर अभी भी भेदभाव होता है; संविधान में अस्पृश्यता समाप्त करने के बावजूद सफाईकर्मियों से हाथ तक नहीं मिलाया जाता है। जाहिर है, शीर्ष अदालत ने न केवल सीवर की सफाई के दौरान होने वाली मौतों पर सवाल उठाया, बल्कि उसकी जड़ों पर भी चोट की।

कायदे से अदालत की टिप्पणियों के बाद सरकार को इस बात पर आत्मालोचन करना चाहिए कि सीवर में आज भी हो रही लगातार मौतों की वजहों के पीछे कहीं इसके शिकार लोगों की सामाजिक पृष्ठभूमि और उनकी उपेक्षा तो नहीं है! वरना क्या कारण है कि सीवर में जहरीली गैसों और उनकी वजह से जान जाने के जोखिम के बारे में पहले से पता होने के बावजूद उसमें मजदूरों को उतारा जाता है और उन्हें न्यूनतम सुरक्षा उपकरण तक से लैस नहीं किया जाता? यह कोई छिपा तथ्य नहीं है कि खतरनाक गैसों से भरे सीवर या गंदे नालों की सफाई के काम में लगे अमूमन सभी लोग समाज के सबसे कमजोर और हाशिये के तबके से आते हैं। यह सब तब भी जारी है जब सुप्रीम कोर्ट अपने एक फैसले के जरिए मल, जल, सीवर, सेप्टिक टैंक या नाले की सफाई हाथ से करने पर रोक के बारे में स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी कर चुका है। लेकिन यह समझना मुश्किल है कि सरकार और संबंधित महकमे मजबूत इच्छाशक्ति के साथ इस मसले के ठोस समाधान की पहल क्यों नहीं करते!

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