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संपादकीय: अवैध की जब्ती

विडंबना यह है कि जो राजनीतिक दल या नेता ऐन मतदान के मौके पर आम मतदाताओं के वोट पैसे या मादक द्रव्यों के बूते खरीदना चाहते हैं, वही सामान्य दिनों में देश के लिए महत्त्वपूर्ण साबित होने वाले मुद्दों पर अपनी राय का प्रसार करने की जरूरत नहीं समझते, ताकि लोगों को सोच-समझ कर अपने पक्ष में वोट देने के लिए जागरूक किया जा सके।

निर्वाचन आयोग द्वारा गठित निगरानी दस्तों ने विभिन्न राज्यों से करीब पांच सौ चालीस करोड़ रुपए मूल्य की नगदी, जेवर, शराब, नशीले पदार्थ आदि की जब्ती की।

आमतौर पर हर चुनाव में अलग-अलग पार्टियों की ओर से मतदाताओं के वोट हासिल करने के मकसद से पैसे देकर या दूसरी सुविधाओं का लाभ पहुंचा कर उन्हें लुभाने के मामले सामने आते रहते हैं। यह एक तरह से स्वच्छ और निष्पक्ष मतदान को प्रभावित करने की कवायद है और इससे आखिरकार लोकतांत्रिक प्रक्रिया बाधित होती है। हालांकि चुनावों के दौरान चुनाव आयोग अपनी ओर से इस तरह की संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखता है और ऐसा करने वालों के पकड़े जाने पर कार्रवाई भी करता है। फिर भी ऐसे मामले आम हैं कि कानून के कठघरे में खड़े होने के डर से बेफिक्र राजनीतिक दल चुनावों में बेलगाम खर्च और भ्रष्ट धन का सहारा लेने से नहीं चूकते हैं। जहां तक फिलहाल जारी सत्रहवीं लोकसभा के चुनावों का सवाल है, अब तक इसके तीन चरण पूरे हो चुके हैं और इस तरह के कई मामले पकड़ में आए हैं। चुनाव आयोग की ओर से मुहैया कराई गई जानकारी के मुताबिक चुनावों के दौरान 24 अप्रैल तक अलग-अलग जगहों पर की गई छापेमारी में करीब साढ़े सात सौ करोड़ रुपए नकद और लगभग बारह सौ करोड़ रुपए के मादक द्रव्य जब्त किए गए हैं।

यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि अवैध तरीके से कहीं रखी गई या ले जाई रही इतनी बड़ी रकम का इस्तेमाल या तो वोट हासिल करने के लिए गलत तरीके से मतदाताओं को प्रभावित करने में होता या फिर उनका उपयोग कानूनी दायरे में नहीं था। इसी तरह एक साथ इतने बड़े पैमाने पर मादक द्रव्यों की जब्ती भी ऐसी ही आशंका को मजबूत करती है। यह किसी से छिपा नहीं है कि चुनावों के दौरान कई उम्मीदवार मतदाताओं को लुभाने के लिए उनके बीच मुफ्त में कुछ सामान या फिर सीधे नकदी ही बांटते हैं। मतदान के एक दिन पहले शराब बांटे जाने के भी मामले सामने आते रहते हैं। इन गतिविधियों का मकसद सिर्फ एक हो सकता है कि किसी भी तरह वोटरों को अपनी ओर लुभाया जा सके। यों अगर कोई राजनीतिक दल अपनी पार्टी की नीतियों और देश में जरूरी मुद्दों पर हस्तक्षेप करके लोगों की मुश्किल और समस्याओं के हल का वादा करके उनके वोट मांगता है तो इसमें कोई हर्ज नहीं है। लेकिन पैसे या शराब बांट कर उन्हें वोट देने के लिए लुभाने की कोशिश गैरकानूनी है और ऐसा करने वालों के खिलाफ चुनाव आयोग को सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।

विडंबना यह है कि जो राजनीतिक दल या नेता ऐन मतदान के मौके पर आम मतदाताओं के वोट पैसे या मादक द्रव्यों के बूते खरीदना चाहते हैं, वही सामान्य दिनों में देश के लिए महत्त्वपूर्ण साबित होने वाले मुद्दों पर अपनी राय का प्रसार करने की जरूरत नहीं समझते, ताकि लोगों को सोच-समझ कर अपने पक्ष में वोट देने के लिए जागरूक किया जा सके। बल्कि कई बार ऐसा लगता है कि ज्यादातर राजनीतिक दल और नेताओं के पास वैसे नीतिगत मसलों पर कोई स्पष्ट राय नहीं होती, जिनसे आम जनता के जीवन पर सीधा असर पड़ता है। शायद यही वजह है कि देश में ऐसे लोगों की संख्या काफी है जो मतदान तो करते हैं, लेकिन उनके सामने देश की दशा और दिशा को समझने और उसके मुताबिक वोट देने का फैसला करने की स्थितियां नहीं होती हैं। जबकि लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है कि एक ओर चुनावों में बहाए जाने वाले अवैध धन पर रोक लगाने के लिए हर उपाय किए जाने चाहिए तो दूसरी ओर मुद्दों पर ठोस और परिपक्व फैसला लेने के लिहाज से आम जनता के राजनीतिक सशक्तिकरण के उपाय भी किए जाएं।

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