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संपादकीय: नागरिकता का दायरा

यह तय है कि एनआरसी की सूची सामने आने के बाद जिस तरह के विवाद उभरे थे, उनके मद्देनजर शिकायतों का निपटारा आसान काम नहीं होगा। हो सकता है कि इस प्रक्रिया में अतिरिक्त सुरक्षा बलों की जरूरत पड़े।

Author May 9, 2019 1:05 AM
असम के नागौन में मतदान केंद्र के बाहर खड़े मतदाता। (फोटोःपीटीआई)

असम में एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर की प्रारंभिक सूची जारी किए जाने में जैसी जल्दबाजी दिखाई गई थी, उसे पूरा करने को लेकर उतनी गंभीरता नहीं दिख रही है। हालांकि पिछले साल जब यह सूची सामने आई थी, तो उसके साथ ही असम में चालीस लाख लोगों के इसके दायरे से बाहर हो जाने की खबर के बाद काफी उथल-पुथल मचने की आशंका स्वाभाविक ही थी। इसके बावजूद केंद्र सरकार ने इसके मुताबिक अपने कदम बढ़ाने के संकेत दिए थे। लेकिन उस दिशा में अब तक जितनी प्रगति हो सकी है, उससे साफ है कि इस मसले को समय पर निपटाने को लेकर सरकार बहुत गंभीर नहीं है। दूसरी ओर, नागरिकता रजिस्टर के मसौदे में कुछ खास लोगों के नाम शामिल करने पर आपत्ति करने वाले कई लोग इन शिकायतों पर विचार करने वाली समिति के सामने नहीं आ रहे थे। इसलिए इस काम में देरी हो रही है। लेकिन बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि असम में एनआरसी को अंतिम रूप देने की समय सीमा इकतीस जुलाई से आगे नहीं बढ़ाई जाएगी। यानी अगर मौजूदा स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ तो सरकार को आने वाले करीब ढाई महीने के भीतर इस काम को पूरा करना होगा।

नागरिकता से संबंधित मामला चूंकि बेहद संवेदनशील है और यह देश में रहने के अधिकार से जुड़ा है, इसलिए इसे लेकर जिस तरह की उथल-पुथल मची, वह स्वाभाविक है। यह एक सामान्य बात है कि बहुत सारे लोग अपनी नागरिकता से संबंधित दस्तावेजी सबूत तैयार करने और उसे संभाल कर रख पाने को लेकर अपेक्षित स्तर तक जागरूक नहीं रहे होंगे। इसलिए ऐसे लोगों के सामने एनआरसी से बाहर रह जाने के बाद मुश्किल होना लाजिमी है। इस व्यावहारिक समस्या को समझते हुए सरकार को इसका कोई हल निकालना चाहिए। शायद इसी पहलू को ध्यान में रख कर अदालत ने एक महीने पहले कहा था कि एनआरसी के मसौदे से बाहर रहने की वजह से दावा दाखिल करने वाले लोगों की ‘असुविधाएं’ न्यूनतम करने के लिए उचित कदम उठाए जाएं। यही वजह है कि एनआरसी संयोजक ने सूची से बाहर रह गए लोगों के नागरिकता संबंधी दावों का सत्यापन परिवार वंशावली और भूमि रिकॉर्ड के आधार पर किए जाने की बात कही थी। अब सरकार और एनआरसी को अंतिम रूप देने के काम में लगे संबंधित महकमों को यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि मामूली वजहों से किसी की नागरिकता और उसके अधिकारों का हनन न हो।

यह तय है कि एनआरसी की सूची सामने आने के बाद जिस तरह के विवाद उभरे थे, उनके मद्देनजर शिकायतों का निपटारा आसान काम नहीं होगा। हो सकता है कि इस प्रक्रिया में अतिरिक्त सुरक्षा बलों की जरूरत पड़े। इसी दलील पर गृह मंत्रालय ने बीती फरवरी में अदालत से यह अनुरोध किया था कि चूंकि लोकसभा चुनावों के दौरान सुरक्षा बलों की अनुपलब्धता होगी, इसलिए नागरिकता पंजी का काम फिलहाल स्थगित किया जाए। लेकिन उस समय भी अदालत ने केंद्र सरकार के रुख पर यह तल्ख टिप्पणी की थी कि केंद्र किसी न किसी तरह असम में एनआरसी का काम रुकवाना चाहता है। अदालत की टिप्पणी अपने आप में यह बताने के लिए काफी है कि इस मसले पर केंद्र सरकार का रवैया या तो ढीला-ढाला है या फिर वह किसी बहाने से इस काम को लंबा खींचना चाहती है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि चालीस लाख से ज्यादा लोगों के सामने नागरिकता का संकट खड़ा होने के क्या नतीजे हो सकते हैं। इसलिए एनआरसी से जुड़े मसले की संवेदनशीलता के मद्देनजर अंतिम सूची तैयार करते हुए विवाद की गुंजाइश को न्यूनतम करने की कोशिश होनी चाहिए।

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