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संपादकीय: सहिष्णुता का पैमाना

सच है कि इस तरह की किसी भी घटना के बाद कानून अपना काम करता है, दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाती है। लेकिन कुछ असामाजिक और अराजक तत्त्वों की गैरकानूनी हरकतों को देश में मौजूद धार्मिक स्वतंत्रता के पूरी तरह बाधित होने के रूप में नहीं देखा जा सकता।

Author June 25, 2019 12:45 AM
झारखंड में चोरी के रोप में मुस्लिम युवक को पीट-पीटकर मार डाला गया। (फोटो सोर्स: ट्विटर/वायर वीडियो)

सामाजिक विविधता की कसौटी पर देखें तो भारत दुनिया के उन गिने-चुने देशों में है जहां अलग-अलग धर्मों और मतों को मानने वाले समूहों या समुदायों को पूरी आजादी है। देश का संविधान यहां के सभी नागरिकों को अपनी आस्था के निर्वाह का अधिकार और गारंटी देता है। इसके बावजूद अगर अमेरिका के विदेश विभाग की ओर से जारी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता रिपोर्ट में भारत के कुछ खास समुदायों की धार्मिक स्वतंत्रता के बाधित होने का दावा किया गया है तो उस पर सवाल उठने लाजिमी हैं। हालांकि यह एक कड़वी सच्चाई है कि देश के अलग-अलग हिस्सों से अराजकता और हिंसा की कुछ ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं, जिनसे ऐसा लगता है कि धर्म के आधार पर कुछ चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। मगर यह भी सच है कि इस तरह की किसी भी घटना के बाद कानून अपना काम करता है, दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाती है। लेकिन कुछ असामाजिक और अराजक तत्त्वों की गैरकानूनी हरकतों को देश में मौजूद धार्मिक स्वतंत्रता के पूरी तरह बाधित होने के रूप में नहीं देखा जा सकता।

स्वाभाविक ही भारत ने अमेरिका की ओर से जारी इस रिपोर्ट को खारिज किया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक और बहुलतावादी समाज वाला देश है जो लंबे समय से सहिष्णुता और समावेश के लिए प्रतिबद्ध है; भारत का संविधान सभी नागरिकों को उनके मौलिक अधिकारों की गारंटी देता है, जिनमें अल्पसंख्यक भी शामिल हैं। जाहिर है, एक ओर संविधान में अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए पूरी व्यवस्था की गई है तो दूसरी ओर सरकार की ओर से आधिकारिक रूप से उन अधिकारों की रक्षा के लिए हर संभव कदम उठाए जाते हैं। सही है कि भारत भौगोलिक रूप से एक बड़ा विविध पहचानों वाला देश है और कई बार यहां कुछ ऐसी अफसोसजनक घटनाएं होती रहती हैं, जिनके पीछे धार्मिक कट्टरता से जुड़ी सोच या व्यवहार मुख्य रूप से जवाबदेह होते हैं। लेकिन इनके आधार पर समूचे देश को एक ही नजर से देख लेना और इसे भारत में धार्मिक स्वतंत्रता पर खतरे के रूप में पेश करना अतिरेक ही माना जाना चाहिए। फिर भी, ऐसी रिपोर्टें आगाह करती हैं कि अगर कुछ घटनाएं ऐसी हो रही हैं जिनसे देश की नकारात्मक छवि बनती है तो उन पर भी पूरी तरह काबू पाया जाए।

हालांकि यह भी सच है कि पिछले कुछ सालों के दौरान असामाजिक तत्त्वों ने एक भीड़ के रूप में गाय की रक्षा के नाम पर एक धर्म-विशेष की पहचान से जुड़े लोगों पर हमले किए, कइयों को पीट-पीट कर मार डाला। ऐसे मामले अब भी सामने आते हैं, जिनमें भीड़ ने किसी अल्पसंख्यक को उसके धर्म से इतर कुछ खास धार्मिक नारे लगाने को मजबूर किया और उसे सार्वजनिक रूप से बुरी तरह मारा-पीटा। इसमें कोई शक नहीं कि पुलिस और प्रशासन ने ऐसे मौकों पर कानूनी कार्रवाई की, लेकिन अब भी ऐसी घटनाएं पूरी तरह रोकी नहीं जा सकी हैं। यह कोई छिपी बात नहीं है कि कई नेता अक्सर बेवजह भड़काऊ भाषण देते हैं। जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक स्तर पर देश में बने उन्माद के माहौल को काबू में किया जाए। किसी भी स्थिति में भीड़ को कानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती। अगर इस प्रवृत्ति पर सख्ती से रोक नहीं लगाई गई तो संविधान में दर्ज अधिकार और सरकार की ओर से सभी धर्मों के लोगों के साथ समान व्यवहार के दावों का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।

 

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