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संपादकीय: करतारपुर का रास्ता

सिखों के लिए करतारपुर का यह गुरद्वारा एक पवित्र स्थान है। अभी तक लोग सीमा के पास से दूरबीनों से ही इसकी झलक भर देख पाते हैं। लेकिन भारत सरकार की सतत ठोस पहल और पाकिस्तान के सकारात्मक रुख से गलियारे का निर्माण हुआ और गुरद्वारे तक पहुंचने का रास्ता बना।

KARTARPUR SAHIB GURUDWARAकरतारपुर साहिब गुरुद्वारा। (image source-ani)

तमाम विवादों और सहमति-असहमति के बीच करतारपुर साहिब गुरद्वारे तक श्रद्धालुओं की पहुंच के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाला समझौता दोनों देशों के रिश्तों में नए युग की शुरुआत से कम नहीं माना जाना चाहिए। करतारपुर गलियारे का रास्ता खुलना और इसके लिए पाकिस्तान के साथ होने वाला समझौता दोनों देशों के बीच जमी बर्फ को पिघलाने का काम कर सकता है। लंबे समय से भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में जो तनाव बना हुआ है, उस स्थिति में यह समझौता होना बड़ी बात है। हालांकि इस समझौते के साथ भारत ने पाकिस्तान से यह उम्मीद की थी कि वह हर तीर्थयात्री से बीस डॉलर का सेवा शुल्क लेने का फैसला टाल दे। लेकिन पाकिस्तान इस शुल्क को लेने पर अड़ा हुआ है। इससे हर श्रद्धालु पर करीब डेढ़ हजार रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। वैसे इस मौके पर पाकिस्तान थोड़ी-सी दरियादिली दिखाए और इस शुल्क को वापस ले ले तो इससे उसका कोई बहुत भारी नुकसान नहीं होने वाला है, बल्कि सिख समुदाय और भारत के मन में उसके प्रति एक जगह ही बनेगी। यह कोई कारोबारी समझौता तो है नहीं जिसमें नफा-नुकसान देखा जाए, बल्कि धार्मिक पर्यटन के तहत रियायत दी जा सकती है। लेकिन भारत ने फिलहाल अपनी ओर से इसे कोई ऐसा मुद्दा नहीं बनाया है जिससे कि समझौते के रास्ते में कोई बाधा पैदा हो।

कश्मीर सहित कई मुद्दों को लेकर समय-समय पर भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते नाजुक दौर में पहुंचते रहे हैं। करगिल युद्ध से ठीक पहले दोनों देशों के बीच लाहौर-दिल्ली बस सेवा शुरू हुई थी। उसके बाद मुनाबाव-खोखरापार रेल लिंक और श्रीनगर-मुजफ्फराबाद बस सेवा के लिए समझौता हुआ था। लेकिन इस साल पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान से रिश्तों में सुधार की सारी उम्मीदें छोड़ दी थीं। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को खत्म किए जाने के बाद से तो दोनों देशों के बीच युद्ध जैसे हालात बन गए और पाकिस्तान ने परमाणु युद्ध तक की धमकी दे डाली। लेकिन इतना सब होते हुए भी अगर पाकिस्तान ने भारतीय सिखों के लिए करतारपुर साहिब गलियारे का रास्ता खोला है तो इससे काफी उम्मीदें बनती हैं।

सिखों के लिए करतारपुर का यह गुरद्वारा एक पवित्र स्थान है। अभी तक लोग सीमा के पास से दूरबीनों से ही इसकी झलक भर देख पाते हैं। लेकिन भारत सरकार की सतत ठोस पहल और पाकिस्तान के सकारात्मक रुख से गलियारे का निर्माण हुआ और गुरद्वारे तक पहुंचने का रास्ता बना। यह गुरद्वारा अंतरराष्ट्रीय सीमा से मात्र साढ़े चार किलोमीटर की दूरी पर है। भारत ने अपने यहां से जाने वाले श्रद्धालुओं को सीमा के पास बड़ी सुविधाएं देने की तैयारी कर ली है। फिलहाल पाकिस्तान ने पांच हजार तीर्थयात्रियों को इजाजत देने का फैसला किया है। हालांकि तीर्थयात्रियों की संख्या पर किसी तरह के प्रतिबंध का कोई औचित्य नजर नहीं आता। करतारपुर साहिब तक श्रद्धालुओं को जाने देने का मामला दो दशक पहले से चला आ रहा था। 1999, 2004 फिर 2008 में भारत ने इस मुद्दे को पाकिस्तान के समक्ष उठाया था, लेकिन पाकिस्तानी हुकूमत की हठधर्मिता के कारण सारी कोशिशें बेकार गर्इं। इसलिए करतारपुर गलियारे पर होने जा रहा समझौता गुरुनानक देव के पांच सौ पचासवें जन्मदिन के मौके पर सिख समुदाय के लोगों के लिए किसी बड़े उपहार से कम नहीं है।

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