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संपादकीय: हादसों की सड़क

विचित्र है कि भारत में दुनिया भर के कुल वाहनों का केवल तीन फीसद है, लेकिन सड़क हादसों में मरने वालों की तादाद के मामले में यह अव्वल है।

Author Published on: December 4, 2019 2:35 AM
दरअसल, एक बड़ी विडंबना वाहन चलाने वालों के भीतर खुद है।

राज्यसभा में सोमवार को प्रश्नकाल के दौरान सड़क हादसों पर जो तस्वीर सामने रखी गई, उससे फिर यह सवाल उठा है कि क्या केवल कानूनों को ज्यादा सख्त बनाना किसी मसले से निपटने का अकेला जरिया हो सकता है! करीब चार महीने पहले ही सरकार ने हादसों में कमी लाने के मकसद से सड़क सुरक्षा के लिए कठोर प्रावधानों से लैस मोटर वाहन (संशोधन) विधेयक को मंजूरी दी थी। मकसद यही था कि कानूनी सख्ती से लोगों में वाहन चलाते समय भय काम करेगा और इस तरह सड़क दुर्घटनाओं पर काबू पाया जा सकेगा।

मगर हकीकत यही है कि लोग वाहन चलाते समय मनमानी करते हैं और कानूनी सख्ती का भय उनमें कम ही होता है। ऐसे चालकों की संख्या काफी है, जो यातायात नियमों का पालन करना अपनी शान के खिलाफ और मनमाने तरीके से गाड़ी चलाना अपना अधिकार समझते हैं। पर सवाल है कि इस तरह की गैरजिम्मेदारी और लापरवाही से वाहन चलाने का हासिल आखिर क्या है?

सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने राज्यसभा में कहा कि पिछले साल के मुकाबले इस साल सड़क हादसों में मामूली कमी दर्ज की गई है, लेकिन अफसोसजनक है कि जितनी भी दुर्घटनाएं हुर्इं, उनमें मरने वाले लोगों की संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गई। उनके मुताबिक इसकी मुख्य वजह सड़क इंजीनियरिंग संबंधी खामियां हैं। उनका यह आकलन सही हो सकता है।

सड़क पर जो लोग वाहन चलाते हैं, उन्हें उन खामियों के मद्देनजर सावधानी बरतनी चाहिए। लेकिन क्या यह जरूरी नहीं था कि अगर सड़कों में ही ऐसी गड़बड़ियां हैं, जो हादसों की वजह बनती हैं, तो उनके बारे में हर स्तर पर जागरूकता फैलाई जाए, जानकारी सार्वजनिक की जाए, ताकि लोग सावधानी बरतें? सड़कों पर ऐसी कई जगहें होती हैं, जहां विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है, सड़क किनारे बोर्ड पर निर्देश भी लिखा होता है, लेकिन कई वाहन चालकों को उन निर्देशों पर गौर करना जरूरी नहीं लगता।

जबकि बेहद मामूली लापरवाही भी बड़े हादसे की वजह बन जाती है और उसमें लोगों की नाहक जान चली जाती है। पिछले साल जनवरी से सितंबर के बीच देश भर में होने वाले सड़क हादसों में कुल एक लाख बारह हजार चार सौ उनसठ लोगों की मौत हो गई और साढ़े तीन लाख से ज्यादा लोग घायल हुए।

विचित्र है कि भारत में दुनिया भर के कुल वाहनों का केवल तीन फीसद है, लेकिन सड़क हादसों में मरने वालों की तादाद के मामले में यह अव्वल है। दरअसल, एक बड़ी विडंबना वाहन चलाने वालों के भीतर खुद है। तय रफ्तार के नियम का पालन करना, शराब पीकर वाहन न चलाना, लेन में रहना, वाहन चलाते समय सजग रहना जैसे कुछ यातायात नियमों का ही पालन कर लिया जाए, तो सड़क हादसों में काफी कमी लाई जा सकती है।

फिर दुर्घटना की स्थिति में अगर सरकार समय पर घायलों को इलाज मुहैया कराने की व्यवस्था कर दे, तो बहुत सारे लोगों की जान बचाई जा सकती है। इसके अलावा, वाहन चालकों को यह समझने की जरूरत है कि नियमों का पालन न केवल सुचारु यातायात व्यवस्था के लिए जरूरी है, बल्कि सड़क पर चलने वाले अन्य लोगों के साथ-साथ खुद का जीवन भी सुरक्षित रहने के लिहाज से अनिवार्य है। अच्छी सड़कें आधुनिक यातायात व्यवस्था के लिए जरूरी हैं, लेकिन उन पर वाहन चलाने का सलीका अगर न हो तो वही सड़कें जानलेवा साबित हो जाती हैं।

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