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संपादकीय: गंगा की गंदगी

उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वे प्रमुख स्थलों पर गंगा जल की गुणवत्ता की जानकारी हर महीने सार्वजनिक करें। हरित अधिकरण ऐसी फटकार पहले भी कई मौकों पर लगा चुका है।

Author March 15, 2019 3:26 AM
हरित अधिकरण ने इसके लिए एनएमसीजी को फटकार लगाई है।

गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाने के लिए करीब तीस साल पहले गंगा कार्ययोजना तैयार की गई थी। इस योजना के तहत अब तक अरबों रुपए खर्च किए जा चुके हैं पर स्थिति यह है कि गंगा दिन पर दिन गंदी ही होती गई है। मौजूदा सरकार ने गंगा की सफाई के लिए एक अलग से मंत्रालय गठित किया। गंगा को राष्ट्रीय नदी का दर्जा दिया गया है। पर इसकी सफाई को लेकर सरकारें कितनी संजीदा हैं, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण के जवाब तलब करने पर राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन यानी एनएमसीजी ने हलफनामा दायर करके बताया कि उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल सरकारों ने समुचित जानकारियां उपलब्ध नहीं कराई हैं, जिससे दूसरे और तीसरे चरण यानी कानपुर से बक्सर और फिर बक्सर से गंगासागर तक की कार्ययोजना की रूपरेखा तैयार करने में मुश्किलें आ रही हैं। हरित अधिकरण ने इसके लिए एनएमसीजी को फटकार लगाई है। इसके साथ ही उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वे प्रमुख स्थलों पर गंगा जल की गुणवत्ता की जानकारी हर महीने सार्वजनिक करें। हरित अधिकरण ऐसी फटकार पहले भी कई मौकों पर लगा चुका है, पर राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के कार्य-व्यवहार में कोई खास बदलाव नजर नहीं आया है।

हालांकि हरित अधिकरण ने अपने ताजा निर्देश में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि एनएमसीजी का गठन गंगा के कायाकल्प के लिए किया गया है और राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के साथ समन्वय उसकी जिम्मेदारी है। अब उसे कोई टाल-मटोल नहीं सुननी। अगर तीस अप्रैल तक गंगा कार्ययोजना की रूपरेखा पेश नहीं की गई तो वह सख्त कदम उठाने को बाध्य होगा। इसके लिए संबंधित राज्य सरकारों को पर्यावरण क्षति का भुगतान करना पड़ सकता है। देखना है, अधिकरण के इस सख्त रुख का राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन और राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों पर कितना और कैसा असर पड़ता है। प्रयाग में कुंभ के दौरान गंगा में मिलने वाली गंदगी को रोकने में बड़ी कामयाबी देखी गई। हरित अधिकरण ने कहा है कि वहां आजमाए गए तकनीकी उपायों का अध्ययन कर इस अभियान में लगे विशेषज्ञों से परामर्श लिया जा सकता है।

दरअसल, राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड नदियों की सफाई को लेकर कभी गंभीर नहीं दिखे। इसमें उनके टाल-मटोल भरे रवैए की कुछ वजहें दूसरी भी हो सकती हैं। गंगा की सफाई के लिए उन्हें न सिर्फ यह बताना होगा कि कहां-कहां किन स्रोतों से कचरा गंगा में आकर मिलता है, बल्कि उन स्रोतों को बंद कराने में भी सक्रिय भागीदारी करनी होगी। छिपी बात नहीं है कि गंगा के प्रदूषित होने का बड़ा कारण शहरों के रिहाइशी इलाकों से निकलने वाले जल-मल और औद्योगिक इकाइयों के रासायनिक कचरे को बिना शोधित किए गंगा में गिरने देना है। औद्योगिक इकाइयों को कई बार निर्देश जारी किए जा चुके हैं कि वे बिना शोधन के औद्योगिक कचरा नदियों में न मिलने दें। इसी तरह शहरी जल-मल के शोधन के लिए जगह-जगह जल-मल शोधन संयंत्र लगाए जाने चाहिए। मगर बड़ी औद्योगिक इकाइयों की राजनीतिक और प्रशासनिक नजदीकी के प्रभाव की वजह से प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड आंखें बंद किए रहते हैं। इसी तरह गंगा के तटों पर किए गए अतिक्रमण हटाने को लेकर मुश्किलें हैं। समझना मुश्किल है कि गंगा जैसी नदियों, जो लोगों की आस्था से जुड़ी हैं, उनमें कचरा मिलने से रोकना इतना मुश्किल क्यों बना हुआ है।

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