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संपादकीय: संकल्प और चुनौती

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया को 2025 तक टीबी मुक्त करने का लक्ष्य रखा है, जबकि भारत ने इससे दो साल पहले यानी 2023 तक इसके खात्मे का संकल्प किया है।

Author Published on: October 21, 2019 1:57 AM
हालांकि सुकून देने वाली बात यह है कि देश में साल 2018 में टीबी के मरीजों की संख्या में पचास हजार की कमी आई है।

तपेदिक (टीबी) जैसे संक्रामक रोग के खात्मे के लिए भारत ने कमर तो कसी है, लेकिन अभी भी लाखों लोग ऐसे हैं जो इस बीमारी से निपटने के लिए सरकार की ओर से चलाए जा रहे अभियान में शामिल नहीं हो पाते। जाहिर है, ऐसे टीबी रोगियों के बारे में पता नहीं चलता और उनका समुचित रूप से इलाज नहीं हो पाता। इसका परिणाम टीबी के मरीजों की बढ़ती संख्या के रूप में सामने आता है। भारत में टीबी के मरीजों की तादाद का मोटा अनुमान सिर्फ अस्पतालों में होने वाले पंजीकरण से ही लग पाता है। ऐसे में जो लोग अस्पताल नहीं जाते हैं और इधर-उधर इलाज कराने को मजबूर होते हैं, वे इस गिनती से बाहर रह जाते हैं। हाल में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि भारत में पिछले साल टीबी के करीब साढ़े पांच लाख मामले दर्ज होने से रह गए। हालांकि सुकून देने वाली बात यह है कि देश में साल 2018 में टीबी के मरीजों की संख्या में पचास हजार की कमी आई है।

भारत में टीबी आज भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। हर साल लाखों लोग इस बीमारी से मर जाते हैं। इससे भी बड़ी संख्या उन लोगों की है जो हर साल इस बीमारी की जद में आते जा रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आजादी के बहत्तर साल बाद भी आखिरकार भारत टीबी से मुक्ति पाने में कामयाब क्यों नहीं हो पाया। टीबी जैसी बीमारी का सीधा संबंध स्वच्छता और स्वास्थ्य से जुड़ा है और दुख की बात यह है कि इन दोनों ही मोर्चों पर भारत की स्थिति दयनीय है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया को 2025 तक टीबी मुक्त करने का लक्ष्य रखा है, जबकि भारत ने इससे दो साल पहले यानी 2023 तक इसके खात्मे का संकल्प किया है। यह एक बड़ी चुनौती इसलिए है कि जितना बड़ा काम है, उसकी तुलना में वक्त और जरूरी संसाधन बहुत कम हैं। दुनिया के सत्ताईस फीसद टीबी मरीज भारत में हैं। समस्या गंभीर इसलिए है कि टीबी के ज्यादातर मामले शुरू में सामने नहीं आ पाते। बीमारी अंदर पनपती रहती है, लेकिन मरीज को कोई ऐसा लक्षण नजर नहीं आता कि उसे जांच कराने की जरूरत महसूस हो। ऐसे में बीमारी बढ़ती चली जाती है। दूसरी बड़ी समस्या यह है कि इस बीमारी के प्रति लोगों में आज भी जागरूकता का अभाव है। शहरी इलाकों में तो फिर लोग अस्पताल चले जाते हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में लोग इलाज के प्रति सजग भी नहीं है। जाहिर है, टीबी उन्मूलन कोई आसान काम नहीं है।

टीबी कोई ऐसी लाइलाज बीमारी नहीं है जिस पर काबू न पाया जा सके। जब पोलियो, चेचक जैसी महामारियों तक का सफाया हो सकता है, श्रीलंका जैसा देश मलेरिया का नामोनिशान मिटा सकता है तो हम टीबी को जड़ से क्यों नहीं खत्म कर सकते? हमारे यहां बड़ी और गंभीर समस्या गंदगी और प्रदूषण की है जिससे निपटने में ज्यादातर सरकारें नाकाम साबित हुई हैं। शहरों और महानगरों में कूड़ों के पहाड़ इस बीमारी को फैला रहे हैं। देश के ज्यादातर शहरों में बढ़ता वायु प्रदूषण इस बीमारी के प्रमुख कारणों में एक है। सरकार के साथ लोगों को भी साफ-सफाई के प्रति जागरूक होने की जरूरत है। टीबी से संक्रमित एक मरीज से छह लोगों में संक्रमण फैलने का खतरा रहता है। अगर टीबी को मिटाने का संकल्प पूरा करना है तो घर-घर जाकर लोगों को जागरूक करना होगा, तभी भारत अगले चार साल में टीबी मुक्त हो पाएगा।

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