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आरक्षण की भूख

राजस्थान में एक बार फिर गुर्जर समुदाय पांच फीसद आरक्षण की मांग लेकर सड़कों पर उतर आया है। रेल की पटरियों पर तंबू गाड़ दिया है। जिस रेल पटरी पर उन्होंने बसेरा डाल रखा है, वह देश की व्यस्ततम रेल लाइन है। इस तरह बहुत सारी गाड़ियों का रास्ता बदलना पड़ा है और कई गाड़ियां रोक दी गई हैं।

Author February 11, 2019 3:00 AM
आरक्षण की मांग को लेकर एनएच 58 पर धरना देते गुर्जर समाज के लोग। (Source: PTI Photo)

राजस्थान में एक बार फिर गुर्जर समुदाय पांच फीसद आरक्षण की मांग लेकर सड़कों पर उतर आया है। रेल की पटरियों पर तंबू गाड़ दिया है। जिस रेल पटरी पर उन्होंने बसेरा डाल रखा है, वह देश की व्यस्ततम रेल लाइन है। इस तरह बहुत सारी गाड़ियों का रास्ता बदलना पड़ा है और कई गाड़ियां रोक दी गई हैं। पिछले तेरह सालों में यह छठा आंदोलन है, जब राज्य सरकार को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। अब तक भाजपा सरकार को चार बार और कांग्रेस को दो बार गुर्जर आरक्षण आंदोलन का सामना करना पड़ा है। हालांकि राजस्थान सरकार ने आंदोलनकारियों से बातचीत की कोशिश की, पर कामयाबी नहीं मिल पाई। पुलिस ने रेल लाइन खुलवाने का प्रयास किया, जिसके चलते आंदोलनकारियों और पुलिस के बीच हिंसक झड़पें भी हुर्इं। इसके पहले भी करीब बारह साल पहले जब यह आंदोलन हिंसक हुआ था, तब करीब तीस लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा और बड़े पैमाने पर आर्थिक नुकसान हुआ था। इसलिए सरकार की कोशिश है कि आंदोलन हिंसक रूप न लेने पाए, पर गुर्जर नेता इस बात पर अड़े हैं कि इस बार वे आरक्षण लेकर ही धरने से उठेंगे। पर मुश्किल यह है कि राज्य सरकार के लिए आरक्षण की मांग पूरी कर पाना संभव नहीं है।

पहली बार जब गुर्जर आंदोलन शुरू हुआ था, तब तत्कालीन भाजपा सरकार ने पांच फीसद आरक्षण की मांग मान ली थी, पर वह मामला अदालत में जाकर निरस्त हो गया था। क्योंकि कानूनी रूप से आरक्षण की सीमा को पचास फीसद से ऊपर नहीं रखा जा सकता। फिर जब राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनी तब भी आंदोलन उठा और उसने मांग मान ली, पर अदालत ने फिर उस पर रोक लगा दी। हालांकि उस समय गुर्जर समुदाय को एक फीसद का आरक्षण मिल गया। अब जब केंद्र सरकार ने सामान्य वर्ग के लिए दस फीसद आरक्षण का प्रावधान किया है, तब गुर्जर समुदाय ने अपनी मांग फिर से उठा दी है कि उन्हें बाकी का चार फीसद आरक्षण भी मिले। अब राज्य सरकार इस मसले को केंद्र के पाले में डाल रही है कि चूंकि यह मामला संविधान संशोधन का है, इसलिए वही इस मांग को पूरा करने की दिशा में कुछ कर सकती है। मगर केंद्र के लिए भी ऐसा करना संभव नहीं है। लिहाजा, इस आंदोलन का नतीजा कुछ निकलने वाला नहीं है।

दरअसल, राजनीतिक दल अपने स्वार्थ के लिए विभिन्न राज्यों में कृषक समुदाय के लोगों को आरक्षण देने का लालच देते रहे हैं। इसी का नतीजा है कि हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन शुरू हुआ, गुजरात में पटेल आंदोलन पर उतरे, महाराष्ट्र में मराठा और राजस्थान में गुर्जर। ये सभी जातियां सामाजिक रूप से सबल मानी जाती हैं। सारे राजनीतिक दलों को पता है कि आरक्षण की सीमा को पचास फीसद से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता। संविधान में जिन समुदायों को आरक्षण मिला हुआ है, उसे कम करके दूसरे समुदायों के लोगों को उसमें हिस्सा नहीं दिया जा सकता। फिर भी जब उन्हें अपना जनाधार बढ़ाना होता है, चुनावों के समय आरक्षण का मुद्दा छेड़ देते हैं। इस तरह आरक्षण का उद्देश्य प्रश्नांकित होता रहता है। विचित्र है कि आरक्षण की मांग करने वाले भी जानते हैं कि संविधान के तहत उनकी मांगों को पूरा करना किसी सरकार के लिए संभव नहीं है, फिर भी वे आंदोलन पर उतर आते हैं।

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