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संपादकीय: क्षेत्रीय विवाद और पश्चिमी रणनीति

अगर इस्लामिक देशों के बीच आपसी लड़ाई खत्म हो गई तो अमेरिकी और रूसी रक्षा उद्योग को भारी नुकसान होगा। ईरान और सऊदी अरब हथियारों के बड़े खरीदार हैं। अगर ईरान और सऊदी अरब के बीच शांति संधि हो गई तो सऊदी अरब अमेरिकी हथियार नहीं खरीदेगा और ईरान रूसी हथियार नहीं खरीदेगा।

Author Published on: October 3, 2019 1:58 AM
अमेरिकी कूटनीति का खेल देखने वाला है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा के चौहत्तरवें अधिवेशन में दुनिया के तमाम नेता पहुंचे और एशियाई क्षेत्र की समस्याओं सहित कई मसलों पर चर्चा की। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ही नहीं, बल्कि तमाम एशियाई नेताओं ने एशियाई क्षेत्र से संबंधित समस्याओं और विवादों पर चिंता जताई। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चिंता में भविष्य में ईरान से आने वाला खतरा स्पष्ट रूप से झलक रहा था। उन्होंने चीन से चल रहे व्यापार युद्ध पर भी चर्चा की और राष्ट्रवाद को अमेरिका की प्राथमिकता बताया। चीन के विदेश मंत्री ने भी अमेरिका से चल रहे व्यापार युद्ध के साथ-साथ म्यांमा की रोहिंग्या समस्या, कश्मीर विवाद और कोरियाई विवाद पर चिंता जताई। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री की चिंता भी रोहिंग्या समस्या थी।

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के भाषण में मुख्य मुद्दा कश्मीर था। भारत के प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार के काम और उपलब्धियों का ब्योरा दिया। अहम बात है कि एशिया से संबंधित समस्याओं को आपस में मिल बैठ कर हल करने के बजाय एशियाई देश संयुक्त राष्ट्र के फोरम पर इसकी चर्चा कर रहे थे। जबकि तमाम एशियाई समस्याओं की जड़ में एशियाई संसाधनों और भूगोल पर कब्जे की लड़ाई है। एशियाई संसाधनों और भूगोल पर कब्जे को लेकर एशियाई मुल्क आपस में ही नहीं लड़ रहे हैं, बल्कि पश्चिमी देशों को हस्तक्षेप करने का मौका भी दे रहे हैं। गौर करें तो यह लड़ाई लंबे समय से चल रही है। दूसरे विश्वयुद्ध की जड़ में भी संसाधन और भौगोलिक रूट थे, जिन पर कई ताकतें कब्जा चाहती थीं।

पश्चिम और मध्य-पूर्व एशिया के इस्लामिक देशों के बीच संघर्ष ऊर्जा संसाधनों को लेकर है। लेकिन ताज्जुब की बात है कि पड़ोसी मुल्क मिल-बैठ कर आपसी विवाद को हल करने के लिए राजी नहीं हैं। म्यांमा की रोहिंग्या समस्या की जड़ में चीनी, दक्षिण कोरियाई और कुछ पश्चिमी देशों की कंपनियां हैं, जिनकी नजर म्यांमा के जंगल, रबर और अन्य संसाधनों पर है। कश्मीर की समस्या भी कहीं न कहीं इसके भौगोलिक महत्त्व को लेकर है। दिलचस्प बात है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में इन क्षेत्रीय विवादों पर बात करने वाले एशियाई नेता आपस में ईमानदारी से बैठ कर समस्या का हल नहीं चाहते।

चीन और ईरान को छोड़ दें, तो कई एशियाई नेता अपने आप को अमेरिकी राष्ट्रपति के लेफ्टिनेंट के तौर पर पेश करने में ज्यादा गर्व महसूस करते रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में भाग लेने अमेरिका पहुंचे कई एशियाई नेताओं ने ट्रंप को नायक बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। वे अपनी समस्याओं को हल करने के लिए ट्रंप की सहायता मांग रहे। और हकीकत यही है, यही अमेरिका चाहता भी है। अमेरिकी तेल, रक्षा उद्योग के आर्थिक हित भी इससे जुड़े हैं। एशियाई विवादों में मध्यस्थता के बहाने अमेरिका का रक्षा और तेल उद्योग फलता-फूलता रहा है।

इस बार भी संयुक्त राष्ट्र महासभा का मंच आलोचना का मंच नजर आया। आलोचना के बीच ज्यादातर नेता विवादों के समाधान के लिए आशान्वित नजर आए। हालांकि सब जानते हैं कि ईरान और सुन्नी अरब देशों की लड़ाई जल्द खत्म नहीं होने वाली। अगर इस्लामिक देशों के बीच आपसी लड़ाई खत्म हो गई तो अमेरिकी रक्षा उद्योग और रूसी रक्षा उद्योग को भारी नुकसान होगा। ईरान और सऊदी अरब हथियारों के बड़े खरीदार हैं। अगर ईरान और सऊदी अरब के बीच शांति संधि हो गई तो सऊदी अरब अमेरिकी हथियार नहीं खरीदेगा और ईरान रूसी हथियार नहीं खरीदेगा।

गौर करने वाली बात है कि 1940 के दशक से ही इस इलाके में तनाव है और इसके पीछे पश्चिमी देशों का दिमाग है। कभी इजराइल और इराक तो कभी ईरान को केंद्र बिंदु बना कर संघर्ष यहां होता रहा है। इसका सबसे ज्यादा लाभ अमेरिकी तेल और रक्षा उद्योग को हुआ है। खाड़ी में जैसे-जैसे तनाव बढ़ता है, तेल के दाम भी बढ़ते हैं और उसका लाभ रूस और अमेरिका की तेल और गैस कंपनियों को होता है। इसलिए इन मुल्कों की कोशिश शांति के बजाए तनाव बनाए रखने की होती है, ताकि वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में मंदी न आए।

हाल में ईरान ने सऊदी अरब के दो तेल केंद्रों पर हमला किया। इसके बाद वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में भारी उछाल आया। अरब क्षेत्र में पिछले अस्सी साल से जैसा तनाव बना हुआ है, उसी तरह से दक्षिण एशिया में भारत और पाकिस्तान, भारत और चीन के बीच भी तनाव है। भारत और पाकिस्तान चाहें तो ईमानदारी से द्विपक्षीय आधार पर आपसी विवाद को हल कर सकते हैं। लेकिन पाकिस्तान ऐसा नहीं चाहता। वह भी अमेरिका की कठपुतली बना हुआ है। अगर भारत और पाकिस्तान के बीच स्थायी शांति हो जाएगी तो इससे दुनिया के कई देशों के आर्थिक हितों का नुकसान होगा।

संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक से इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी की भी मुलाकात हुई। फिलहाल भारत ने ईरान से तेल आयात बंद कर दिया है। यही नहीं, भारत ने अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों के कारण ईरान के चाबहार बंदरगार के विकास की गति भी धीमी कर दी है। जबकि भारत को अमेरिकी दबाव से बाहर निकल कर ईरान से क्षेत्रीय सहयोग तेज करना चाहिए, क्योंकि भारत का अफगानिस्तान में प्रवेश का एकमात्र रास्ता ईरान है। यह सच्चाई है कि अमेरिकी दबाव में भारत ईरान से स्थायी द्विपक्षीय संबंध विकसित करने में विफल रहा है। भारत के लिए जरूरी ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइप लाइन के विकास पर बात आगे नहीं बढ़ सकी।

अमेरिकी कूटनीति का खेल देखने वाला है। एक तरफ संयुक्त राष्ट्र महासभा में डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खतरे से दुनिया को अगाह किया। इमरान खान के साथ की गई प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी ट्रंप ने ईरानी आतंक को ज्यादा खतरनाक बताया। लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष भी है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में ईरान पर हमला करने वाले ट्रंप ने ईरान से बातचीत का रास्ता भी खोल रखा है। ट्रंप ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान से ईरानी नेतृत्व से बातचीत करने का आग्रह किया है, ताकि ईरान के साथ चल रहे तनाव को कम किया जा सके। इसका खुलासा खुद इमरान खान ने किया। इमरान खान के अनुसार ट्रंप ने उनसे मध्यस्थता का आग्रह किया और उन्होंने ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी से बातचीत की है। खान ने यह भी खुलासा किया कि सऊदी राजकुमार मोहम्मद बिन सलमान ने भी उनसे ईरानी राष्ट्रपति से बातचीत करने को कहा है ताकि क्षेत्रीय तनाव कम हो। ट्रंप के लिए पाकिस्तान आज भी महत्त्वपूर्ण है। पाकिस्तान भौगोलिक रूप से जहां ईरान और अफगानिस्तान के नजदीक है, वहीं सुन्नी देश होने के कारण वह सऊदी अरब जैसे इस्लामिक देशों के नजदीक है।

अमेरिकी जमीन पर जाकर अपनी समस्याओं को बताने वाले एशियाई नेता गंभीरता से यह विचार करें कि संसाधनों से भरपूर होने के बावजूद एशियाई मुल्क गरीबी से क्यों जूझ रहे हैं। एशियाई मुल्कों में आखिर क्यों बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा का आभाव है? आखिर क्यों गरीबी, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत और पाकिस्तान दोनों देश अच्छी हालत में नहीं हैं? मध्य एशिया और पूर्वी एशिया के देश भी संसाधन संपन्न होने के बावजूद गरीबी और बेरोजगारी से जूझ रहे हैं। दिलचस्प स्थिति यह है कि आपसी विवाद खत्म करने की स्थायी योजना एशियाई मुल्कों ने अभी तक नहीं बनाई है। परस्पर विवादों को सुलझाने के लिए ये आपस में गंभीरता से बातचीत नहीं करते। इनके विवादों की पंचायत पश्चिमी देश करते हैं। इसीलिए संयुक्त राष्ट्र महासभा में कई विवादों और समस्याओं पर लंबे समय से चर्चा चल रही है, लेकिन हल आज तक किसी का नहीं निकला है।

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