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संपादकीय: संकट और सवाल

बैंक से पैसा निकालने पर जब अचानक से पाबंदी लगा दी जाती है तो ग्राहक मुश्किल में फंस में जाते हैं। सहकारी बैंकों में खाता खुलवाना लोग इसलिए भी ज्यादा पसंद करते हैं कि ये बैंक दूसरे व्यावसायिक बैंकों के मुकाबले ब्याज ज्यादा देते हैं।

Author Published on: January 16, 2020 1:02 AM
रिजर्व बैंक (प्रतीकात्मक तस्वीर)

महाराष्ट्र के पीएमसी बैंक घोटाले का मामला अभी पूरी तरह से शांत भी नहीं पड़ा था कि अब बंगलुरू के श्री गुरु राघवेंद्र सहकारा बैंक के ग्राहकों की नींद उड़ गई है। रिजर्व बैंक ने दस जनवरी से इस बैंक से पैंतीस हजार रुपए से ज्यादा राशि की निकासी पर पाबंदी लगा दी है। ग्राहक अब छह महीने में पैंतीस हजार रुपए से ज्यादा नहीं निकाल पाएंगे। जाहिर है, करीब बैंक के नौ हजार ग्राहकों के समक्ष गंभीर संकट खड़ा हो गया है और यह वैसा ही मामला है, जैसा कि पीएमसी बैंक घोटाला उजागर होने के बाद देखने को मिला था। बंगलुरू का ये सहकारी बैंक भी बासठ बड़े कर्जदारों से पैसा वसूल पाने में नाकाम रहा और इस वजह से उसकी साढ़े तीन अरब से ज्यादा की रकम एनपीए में तब्दील हो गई। बैंक अब नए कर्ज भी नहीं दे पाएगा, न कोई निवेश कर सकेगा, न ही संपत्ति बेच सकेगा। हालांकि बैंक अपने स्तर पर सफाई दे रहा है कि ग्राहकों का पैसा सुरक्षित है और सभी को उनकी जमा राशि लौटा दी जाएगी। लेकिन सवाल ये उठता है कि आखिर ग्राहक बैंकों के इस कुप्रबंधन का खमियाजा कब तक उठाते रहेंगे? क्यों नहीं बैंक ने पहले से ऐसे कदम उठाए जिससे ये नौबत ही नहीं आती?

बैंक से पैसा निकालने पर जब अचानक से पाबंदी लगा दी जाती है तो ग्राहक मुश्किल में फंस में जाते हैं। सहकारी बैंकों में खाता खुलवाना लोग इसलिए भी ज्यादा पसंद करते हैं कि ये बैंक दूसरे व्यावसायिक बैंकों के मुकाबले ब्याज ज्यादा देते हैं। इसलिए छोटे-मोटे कारोबारियों से लेकर सेवानिवृत्त लोग तक जीवनभर की कमाई बैंकों में एफडी के रूप में रखते हैं और एफडी का ब्याज ही इनकी आमद का बड़ा जरिया होता है। ऐसे में अगर पैसा मिलना बंद हो जाए तो कैसे-कैसे गंभीर संकटों से दो-चार होना पड़ता है, ये पीएमसी के ग्राहकों की पीड़ा से हम देख चुके हैं। अपने पैसे के लिए लोग बैंकों के दरवाजे पर सिर पटक-पटक मर गए थे, लेकिन पैसा नहीं निकल पाया था। गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोग पैसे को तरस गए थे। घर के राशन से लेकर बच्चों की फीस तक भरना मुश्किल हो गया था। पीएमसी बैंक के कुछ ग्राहकों की तो पैसा डूब जाने के सदमे में जान तक चली गई। अगर लोगों की जमा गाढ़ी कमाई इस तरह से बैंकों में फंसने लगेगी तो लोग क्या करेंगे, यह सवाल अभी भी बना हुआ है, जिसका जवाब न बैंकों के पास है, न सरकार और रिजर्व बैंक के पास।

सहकारी बैंक हों या बड़े सरकारी और निजी बैंक, पिछले कुछ सालों में जिस तरह से बैंकों में घोटालों और गड़बड़ियों का खुलासा होता रहा है, उससे लोगों का बैंकों पर से भरोसा उठ गया है। आज हर बैंक ग्राहक इस खौफ में जी रहा है कि कहीं उसके साथ ऐसा न हो जाए। जब किसी बैंक पर ग्राहकों के धन की निकासी जैसी कठोर पाबंदियां लगा दी जाती हैं तो पैसा लंबे समय तक के लिए अनिश्चितता में फंस जाता है। उस वक्त कोई यह नहीं बता सकता कि अंतिम समाधान कितने महीनों या सालों में होगा और लोगों की फंसी पूंजी कब निकलेगी। रिजर्व बैंक को इस बारे में सोचना चाहिए कि अगर किसी बैंक पर इस तरह की कड़ी कार्रवाई करने की जरूरत है तो पहले यह सुनिश्चित हो कि लोगों के पैसे जब्त न हों।

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