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संपादकीय: रफाल की गुत्थी

रफाल की खरीद भारतीय वायुसेना के लिए अहम फैसला था।

Author Published on: November 15, 2019 2:42 AM
सरकार भी इस मामले में सार्वजनिक रूप से ब्योरेवार सफाई नहीं दे सकती थी, क्योंकि यह सुरक्षा से जुड़ा मामला था।

लड़ाकू विमान रफाल की खरीद को लेकर उठे विवाद का एक तरह से पटाक्षेप हो गया। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है कि रफाल मामले में जांच की कोई जरूरत नहीं है। इसकी खरीद में अनियमितता का आरोप था। इस मामले को कांग्रेस ने जम कर भुनाया था। पिछले लोकसभा चुनावों में उसने रफाल खरीद में हुई अनियमितता को मुख्य मुद्दा बनाया था। इसके तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गांधी ने देश भर के मंचों से रफाल खरीद में घोटाले का आरोप लगाते हुए प्रधानमंत्री को अपने निशाने पर रखा था। प्रधानमंत्री के खिलाफ निराधार जुमला उछालने पर उनके खिलाफ मामला भी दर्ज कराया गया था। तब राहुल गांधी ने अपने जुमले उछालने के लिए माफी मांगी थी। इन दोनों मामलों पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपना फैसला सुना दिया। राहुल गांधी की माफी को पर्याप्त मानते हुए उन्हें दुबारा ऐसा न करने की हिदायत भी दी। इस तरह रफाल मामले से जुड़े अनियमितता के आरोप निराधार साबित हुए हैं।

रफाल की खरीद भारतीय वायुसेना के लिए अहम फैसला था। वायुसेना के पास अत्याधुनिक हथियारों से लैस विमानों की कमी लंबे समय से महसूस की जा रही थी। इसी के मद्देनजर अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय रफाल की खरीद का प्रस्ताव लाया गया था। फिर यूपीए सरकार के समय काफी जांच-परख के बाद रफाल को उपयुक्त विमान माना गया था। मगर सौदा अंतिम रूप नहीं ले पाया था। तब एक सौ छब्बीस रफाल विमान खरीदे जाने थे। फिर भाजपा की अगुआई वाली सरकार बनी तो प्रधानमंत्री ने फ्रांस दौरे के वक्त छत्तीस रफाल विमानों की खरीद का सौदा पक्का कर लिया था। यह वायुसेना का मनोबल बढ़ाने वाला कदम था।

मगर इस सौदे की प्रकृति को देखते हुए कुछ लोगों ने इसमें गड़बड़ी की आशंका जाहिर की थी। फ्रांस सरकार की तरफ से भी कुछ प्रतिकूल बयान आ गए थे, जिससे विपक्षी दलों को सरकार को घेरने का मौका हाथ लगा था। वे मांग करने लगे कि रफाल सौदे का ब्योरा सार्वजनिक किया जाए। मगर चूंकि यह प्रतिरक्षा से जुड़ा मामला था, इसलिए इसके बारे में कोई भी गोपनीय सूचना सार्वजनिक करना उचित नहीं था। फिर कई सवाल उठने शुरू हो गए थे। पहली बात यह कि जब सौदा हुआ, तो उसमें लंबे समय की अनुभवी सरकारी विमानन कंपनी हिंदुस्तान एअरोनाटिक्स लिमिटेड को सहभागी बनाने के बजाय कुछ ही दिनों पहले बनी और विमानन के क्षेत्र में कोई अनुभव न रखने वाली एक नई निजी कंपनी को साझीदार क्यों बनाया गया! फिर यह कि जब जरूरत एक सौ छब्बीस विमानों की थी, तो सिर्फ छत्तीस विमान, वह भी पहले के सौदे से कहीं अधिक कीमत पर खरीदने की क्या तुक थी?

रक्षा सौदों में दलाली वगैरह के आरोप नए नहीं हैं, इसलिए रफाल की खरीद में भी अनियमितता को लेकर लोगों के मन में शंका बनी हुई थी। सामान्य लोगों को लड़ाकू विमानों के तकनीकी पहलुओं की जानकारी न होने के कारण उन्हें यह समझाना कठिन होता है कि एक सामान्य विमान और अत्याधुनिक सैन्य साजो-सामान से लैस विमान की कीमत में कैसे अंतर आ जाता है। सरकार भी इस मामले में सार्वजनिक रूप से ब्योरेवार सफाई नहीं दे सकती थी, क्योंकि यह सुरक्षा से जुड़ा मामला था। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय ने भी ब्योरेवार टिप्पणी करने के बजाय सपाट तरीके से मामले पर पुनर्विचार की जरूरत को खारिज कर दिया। इस तरह सरकार भी बेदाग साबित हुई।

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