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संपादकीय: संजीदगी पर सवाल

रोज ही बच्चों की मौत हो रही है। चिकित्सक समझ नहीं पा रहे कि इस महामारी पर काबू कैसे पाया जाए। इस बीच केंद्रीय स्वास्थ्य और स्वास्थ्य राज्यमंत्री स्थिति का जायजा ले और अपनी संवेदना प्रकट कर आए।

Author Published on: June 20, 2019 12:46 AM
बिहार के मुजफ्फरपुर के एसकेएमसीएच अस्पताल में एईएस का लक्षण दिखने के बाद भर्ती बच्चे। (Photo: PTI)

सरकारों की संवेदनशीलता और संजीदगी की परख तब अधिक होती है जब किसी प्राकृतिक आपदा या महामारी की स्थिति पैदा हो जाती है। बिहार के मुजफ्फरपुर इलाके में करीब दो हफ्ते से दिमागी बुखार का प्रकोप है। रोज ही बच्चों की मौत हो रही है। चिकित्सक समझ नहीं पा रहे कि इस महामारी पर काबू कैसे पाया जाए। इस बीच केंद्रीय स्वास्थ्य और स्वास्थ्य राज्यमंत्री स्थिति का जायजा ले और अपनी संवेदना प्रकट कर आए। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने इस बीमारी पर काबू पाने के लिए बेहतर सुविधाओं वाला एक अस्पताल बनाने का आश्वासन भी दिया। मगर सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सबसे बाद में मरीजों का हाल जानने पहुंचे। वे पिछले सप्ताहांत दिल्ली में थे। सोमवार को पटना पहुंचने के बाद उन्होंने अफसरों की बैठक बुलाई, तब प्रशासन कुछ हरकत में आया। यानी करीब दस दिन बाद मुख्यमंत्री मुजफ्फरपुर पहुंचे और अस्पताल प्रबंधन और चिकित्सकों से बात करके वापस लौट पड़े। हालांकि उन्होंने बेहतर इलाज के निर्देश दिए और घोषणा की कि दिमागी बुखार से पीड़ित हर मरीज की चिकित्सा, चाहे वह सरकारी अस्पताल में हो या निजी, सारा खर्च राज्य सरकार वहन करेगी। पर मुख्यमंत्री के प्रति लोगों का रोष कम नहीं हुआ। उन्होंने उनके खिलाफ नारे लगाए।

दरअसल, दिमागी बुखार की समस्या नई नहीं है। यह हर साल इस मौसम में बच्चों को अपनी चपेट में लेता है और अनेक बच्चे काल कवलित हो जाते हैं। कोई ऐसा साल नहीं जब सौ से ऊपर बच्चे इस बीमारी से न मारे गए हों। इस साल भी यह संख्या करीब डेढ़ सौ पहुंच रही है। पांच साल पहले भी जब दिमागी बुखार से तीन सौ से ऊपर बच्चे मारे गए थे तो तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने विशेष सुविधाओं वाला एक अस्पताल बनवाने की घोषणा की थी। अब तक उस पर कोई पहल नहीं हुई है। यह बीमारी हर साल मुजफ्फरपुर इलाके में ही सबसे भयावह रूप लेती है। वहां एक ही सरकारी अस्पताल है, जिस पर लोग अपने बच्चों के इलाज के लिए निर्भर हैं। पर वहां न तो माकूल सुविधाएं हैं और न जांच के समुचित साधन। विचित्र है कि अभी तक इस बीमारी की कोई कारगर दवा नहीं खोजी जा सकी है। इसलिए चिकित्सकों की परेशानी समझी जा सकती है। फिर इस बुखार की चपेट में आने वाले ज्यादातर बच्चे गरीब तबके के होते हैं, उनके माता-पिता इलाज के लिए उन्हें किसी अच्छे अस्पताल में नहीं ले जा पाते। इन तथ्यों से वाकिफ होते हुए भी बिहार सरकार समय रहते इस समस्या से पार पाने के उपायों पर ध्यान नहीं देती, तो यह उसकी संवेदनहीनता का ही परिचायक है।

स्थिति गंभीर होने के बाद अस्पतालों के दौरे पर चले जाने या फिर मुफ्त इलाज की घोषणा कर देने भर से समस्या का हल नहीं निकल आता। स्वास्थ्य समवर्ती सूची का मामला है। केंद्र से तैयार होने वाली योजनाओं को आखिरकार राज्य सरकारों को ही लक्ष्य तक पहुंचाना होता है। गरीबों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने को लेकर कई योजनाएं हैं, पर उनका लाभ लक्षित लोगों को नहीं मिल पा रहा, तो यह राज्य सरकार की नाकामी ही कही जाएगी। समझना मुश्किल है कि जिस इलाके में हर साल इसी मौसम में एक खास तरह का विषाणु अपने पांव पसारता और सैकड़ों बच्चों को लील जाता है, उस पर काबू पाने के लिए आज तक कोई कारगर उपाय करने की कोशिश क्यों नहीं की गई!

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