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संपादकीय: सेहत की सूरत

सवाल है कि जब राज्य खुद बीमार होंगे तो जनता कैसे स्वस्थ होगी! बिहार और उत्तर प्रदेश में इन्सेफलाइटिस का प्रकोप कोई नया नहीं है। दोनों राज्यों में पिछले कुछ सालों में इस बुखार से मरने वाले बच्चों का आंकड़ा हजारों में है।

Author June 27, 2019 1:56 AM
बिहार में चमकी बुखार से 170 से अधिक बच्चों की मौत हो चुकी है। (फाइल फोटो)

जनता को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के मामले में देश के दो राज्यों बिहार और उत्तर प्रदेश की हालत सबसे ज्यादा खराब है। चौंकाने वाली और शर्मनाक बात यह है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में इन दोनों राज्यों की स्थिति सुधरने के बजाय बिगड़ती जा रही है। इसका ताजा प्रमाण बिहार में इन्सेफलाइटिस से डेढ़ सौ से ज्यादा बच्चों की मौत है। नीति आयोग ने मंगलवार को देश के इक्कीस राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की जो स्वास्थ्य सूचकांक रिपोर्ट जारी की, उसमें यह हकीकत सामने आई है। नीति आयोग ने यह सूचकांक विश्व बैंक और केंद्रीय स्वास्थ्य परिवार कल्याण मंत्रालय के साथ मिल कर बनाया है। सबसे बेहतर स्थिति केरल की है। दूसरे स्थान पर आंध्र प्रदेश, तीसरे पर महाराष्ट्र, चौथे पर गुजरात और पांचवें पर पंजाब है। जबकि अंतिम पांच स्थानों पर उत्तराखंड, ओड़ीशा, मध्य प्रदेश, बिहार और उत्तर प्रदेश हैं। यह रिपोर्ट 2017-18 के कामकाज के आकलन को ध्यान में रख कर बनाई गई है। उत्तर भारत के बड़े राज्यों जैसे मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार में तो स्वास्थ्य सेवाएं एकदम चौपट हैं। जबकि दक्षिणी राज्यों- केरल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु इस क्षेत्र में अच्छा काम कर रहे हैं। केंद्र शासित राज्यों में चंडीगढ़ पहले नंबर है तो दिल्ली पांचवें पर।

सवाल है कि जब राज्य खुद बीमार होंगे तो जनता कैसे स्वस्थ होगी! बिहार और उत्तर प्रदेश में इन्सेफलाइटिस का प्रकोप कोई नया नहीं है। दोनों राज्यों में पिछले कुछ सालों में इस बुखार से मरने वाले बच्चों का आंकड़ा हजारों में है। लेकिन इन दोनों ही राज्यों ने इन्सेफलाइटिस से निपटने के लिए कुछ खास नहीं किया। इसका मूल कारण यह है कि खासतौर से गरीब और वंचित तबकों के मामले में सरकारें एकदम लापरवाह हैं। पटना और लखनऊ जैसे शहरों में स्वास्थ्य सेवाएं खस्ताहाल हैं, लोगों को इलाज के लिए दिल्ली भागने को मजबूर होना पड़ता है। जनपदों का तो और भी बुरा हाल है। ज्यादातर जगहों पर अस्पताल तो हैं, पर जर्जर हालत और गंदगी के शिकार हैं। उनमें पानी-बिजली नहीं है। डॉक्टर हैं, पर काम नहीं करते, आॅपरेशन थिएटर हैं तो संक्रमित। दवाइयों की खरीद-आपूर्ति में भ्रष्टाचार जगजाहिर है। इन दिनों मुजफ्फरपुर जिले के अस्पताल की हालत तो पूरे देश ने देखी। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की टीम ने तो एक अस्पताल को मूल्यांकन लायक भी नहीं पाया। सिर्फ बिहार, उत्तर प्रदेश ही नहीं, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान जैसे राज्यों में भी सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं ऐसी ही दम तोड़ती हालत में हैं। दूसरी ओर निजी अस्पताल चांदी काट रहे हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं कि राज्यों में स्वास्थ्य सेवाएं चौपट करने में सबसे बड़ी भूमिका सरकारों की है। स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए राज्यों का अपना भारी-भरकम बजट होता है, लेकिन हालात बता रहे हैं कि यह पैसा स्वास्थ्य क्षेत्र पर खर्च होने के बजाय कहीं और चला जा रहा है। एक भी अस्पताल ऐसा नहीं है जो विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से निर्धारित मानकों को पूरा करता हो। अगर स्वास्थ्य क्षेत्र पर सरकारें ईमानदारी से पैसा खर्च करतीं तो आज लोगों को इलाज के लिए दर-दर भटकना नहीं पड़ रहा होता, सैकड़ों बच्चे इन्सेफलाइटिस से नहीं मरते, बड़ी संख्या में बच्चे कुपोषित नहीं होते! दरअसल, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल जैसी बुनियादी जरूरतें राज्य सरकारों की प्राथमिकता में हैं ही नहीं। दिल्ली तो राजधानी है, वहीं स्वास्थ्य सेवाएं बदतर हालत में हैं, एम्स जैसे विख्यात संस्थान में मरीजों की भीड़ और महीनों का इंतजार हालात बयान करने के लिए काफी है। जब तंत्र ही बीमर होगा तो जनता कैसे स्वस्थ्य रहेगी? क्या इस मसले पर केरल जैसे राज्यों से ही सीख नहीं ली जा सकती?

 

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