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संपादकीय: आखिर राष्ट्रपति शासन

गौरतलब है कि विधानसभा चुनाव के नतीजों में महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना के गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिला था।

Author Published on: November 13, 2019 2:18 AM
सिफारिश को मंत्रिमंडल और फिर राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने में ज्यादा वक्त नहीं लगा।

महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के करीब एक पखवाड़े तक सरकार बनाने को लेकर दावेदार राजनीतिक पार्टियों के बीच चली उठापटक के बाद आखिरकार वहां राष्ट्रपति शासन लागू हो गया। हालांकि राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने पहले शिवसेना और फिर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को सरकार बनाने के लिए अपना दावा पेश करने के लिए मंगलवार रात साढ़े आठ बजे तक का समय दिया था, लेकिन उसके पहले ही उन्होंने राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर दी। इसके बाद सिफारिश को मंत्रिमंडल और फिर राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने में ज्यादा वक्त नहीं लगा।

महाराष्ट्र के राज्यपाल के मुताबिक राज्य में सरकार गठन की तमाम कवायदों के बाद भी राजनीतिक गतिरोध बरकरार रहा और दावे के बावजूद शिवसेना समर्थन का पत्र नहीं दे सकी। इसके अलावा, राकांपा और कांग्रेस पार्टी के बीच भी ऊहापोह की स्थिति बनी रही और विधायकों की खरीद-बिक्री के आरोप सामने आने लगे। दरअसल, सरकार बनाने में भाजपा की नाकामी के बाद भी एक तरह से अस्पष्ट स्थिति बनी हुई थी और शिवसेना को राकांपा-कांग्रेस गठबंधन की ओर से मिलने वाले समर्थन पर भी कोई साफ राय सामने नहीं आ रही थी।

संभव है कि राज्यपाल ने सरकार गठन को लेकर संबंधित पार्टियों के ऊहापोह को भविष्य में राजनीतिक अस्थिरता पैदा होने का संकेत माना हो, लेकिन राजनीतिक हलकों में यह उम्मीद थी कि भाजपा के सरकार बनाने में नाकाम रहने के बाद बनती नई तस्वीर में शिवसेना और राकांपा-कांग्रेस गठबंधन को मौका दिया जाएगा। अब सवाल यह उठ रहे हैं कि राज्यपाल ने विभिन्न पक्षों को समय देने के मामले में इस तरह का अतार्किक और भेदभावपूर्ण रवैया क्यों अख्तियार किया! खासतौर पर तब, जब शिवसेना और राकांपा-कांग्रेस के नेताओं के बीच आपसी बातचीत निर्णायक दौर में थी।

शायद इन्हीं वजहों से शिवसेना को यह शिकायत करने का मौका मिला है कि राज्यपाल ने भाजपा को सरकार बनाने के बारे में बताने के लिए अड़तालीस घंटे का समय दिया था, लेकिन शिवसेना को समर्थन पत्र हासिल करने के लिए भी महज चौबीस घंटे का वक्त दिया गया। राज्यपाल के रुख को बेहद जल्दबाजी भरा बताते हुए शिवसेना ने सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में आग्रह किया कि चूंकि शिवसेना को वक्त न देने का फैसला असंवैधानिक, मनमाना, अवैध और समानता के अधिकार का उल्लंघन है, इसलिए अदालत सरकार बनाने के लिए उसे वाजिब समय देने का निर्देश जारी करे।

गौरतलब है कि विधानसभा चुनाव के नतीजों में महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना के गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिला था। लेकिन हैरानी की बात यह सामने आई कि दोनों पार्टियों के बीच सरकार बनाने और उसमें हिस्सेदारी की शर्तों पर मतभेद पैदा हो गए। यहां तक कि शिवसेना ने भाजपा पर वादाखिलाफी का आरोप लगाया और गठबंधन से बाहर राकांपा-कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने की कवायद भी शुरू कर दी। इन तीनों दलों के बीच बातचीत की जैसी तस्वीर अब तक उभर कर सामने आ सकी थी, उससे ऐसा लग रहा था कि राकांपा-कांग्रेस के समर्थन से शिवसेना की सरकार बन जाएगी।

लेकिन इस मसले पर किसी निर्णय पर पहुंचने से पहले ही ऐसी स्थिति पैदा हुई कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया। जाहिर है, तस्वीर लगभग साफ होने के बाद भी उपजी इस विचित्र स्थिति के बाद फिलहाल सरकार के गठन की कवायद और उलझ गई। अब देखने की बात यह होगी कि सुप्रीम कोर्ट के जरिए कोई फैसला या निर्देश आने में कितना वक्त लगता है और तब तक राजनीतिक गतिविधियों और तालमेल का क्या स्वरूप रह पाता है! बेहतर यह होता कि सरकार गठन के मामले में किसी पार्टी के पास बहुमत होने और लोकतंत्र के तकाजे का खयाल रखा जाता।

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