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संपादकीय: मजबूरी की राजनीति

सब जानते हैं कि आज मुलायम सिंह और मायावती राजनीतिक मजबूरियों की वजह से एक-दूसरे का सम्मान कर रहे हैं। हालांकि दोनों नेताओं के लिए निजी दुश्मनी भी भुला देने के लिए इससे बेहतर और क्या वक्त हो सकता है!

Author April 22, 2019 1:59 AM
मायावती और अखिलेश यादव

कहते हैं राजनीति में न कोई दोस्त होता है और न दुश्मन। दोस्त या दुश्मन जो भी होता है, राजनीतिक मजबूरियों, हितों और स्वार्थों की वजह से होता है। ये दोस्ती-दुश्मनी मौका-परस्त होती है। शुक्रवार को मैनपुरी में जब समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव और बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती मंच पर एक साथ आए तो लग ही नहीं रहा था दोनों के बीच लंबे समय से कोई गंभीर कटुता रही होगी या स्थायी दुश्मनी जैसी कोई बात थी। दोनों ने एक-दूसरे की तारीफ में जम कर कसीदे पढ़े, एक-दूसरे को जिताने के लिए वोट मांगे, मायावती ने मुलायम सिंह के प्रति जिस तरह से सम्मान दिखाया, उसके लिए उनकी जितनी तारीफ की जाए, कम होगी। मुलायम ने भी बड़प्पन दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। साथ मिल कर चुनाव लड़ने के लिए सपा और बसपा में गठबंधन तो पहले ही हो चुका था। लेकिन तबसे ये कयास लगाए जा रहे थे कि क्या मुलायम सिंह यादव और मायावती पुरानी बातों को भुला कर एक मंच पर आएंगे! हालांकि दोनों नेताओं ने गठबंधन बहुत ही मजबूरी में और सोच-समझ कर किया है। दोनों को अपने राजनीतिक अस्तित्व को लेकर खतरा साफ नजर आ रहा था। ऐसे में उत्तर प्रदेश की राजनीति से लेकर केंद्र तक में एक बड़ी चुनौती के लिए सपा-बसपा गठजोड़ की जरूरत महसूस की गई।

उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा के गठबंधन की पहली सरकार 1993 में बनी थी। तब मुलायम सिंह मुख्यमंत्री थे। लेकिन, जैसा कि कहा जाता है, उन्हें इस बात का डर सता रहा था कि भाजपा बसपा को समर्थन देकर उन्हें हटा सकती है और मायावती को मुख्यमंत्री बनवा सकती है। सत्ता को लेकर इस तरह की आशंकाओं की परिणति दो जून 1995 को देखने को मिली, जब लखनऊ के राज्य अतिथि गृह में सपा विधायकों और कार्यकर्ताओं ने मायावती और उनके विधायकों पर हमला बोल दिया। मायावती ने तब किसी तरह अपनी जान बचाई। इस हिंसक घटना के बाद सपा और बसपा के रास्ते हमेशा के लिए अलग हो गए थे। दोनों दलों के प्रमुख एक-दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते थे। ढाई दशक के दौरान सपा भी सत्ता में रही और बसपा भी, लेकिन कहीं कोई मेल-मिलाप की संभावना नहीं बनी, उल्टे एक-दूसरे को सबक सिखाने के संकल्प किए गए थे।

उत्तर प्रदेश में ढाई दशक तक सपा और बसपा पिछड़ों और दलितों के नाम पर सत्ता में आती-जाती रहीं। देश की दलित राजनीति को एक नया आयाम भी मिला। लेकिन जनता लंबे समय से इन दोनों दलों के शासन से उकता गई और पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनाव में सपा-बसपा को उनकी हैसियत दिखा दी। सन् 2007 में पूर्ण बहुमत हासिल कर सत्ता में आने वाली बसपा को पिछले लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं मिली थी। 2017 में सूबे की सत्ता से सपा बाहर हो गई। इसके बाद से ही दोनों दल इस जमीनी हकीकत को समझने लगे थे कि अगर मिल कर चुनाव नहीं लड़ा तो स्थायी रूप से उत्तर प्रदेश की सत्ता से छुट्टी हो सकती है। दोनों दलों का पहला मकसद भाजपा को शिकस्त देना है। सब जानते हैं कि आज मुलायम सिंह और मायावती राजनीतिक मजबूरियों की वजह से एक-दूसरे का सम्मान कर रहे हैं। हालांकि दोनों नेताओं के लिए निजी दुश्मनी भी भुला देने के लिए इससे बेहतर और क्या वक्त हो सकता है!

 

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