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संपादकीय: गरीबों की बिगड़ती सेहत

हमारे देश की जनसंख्या सवा सौ करोड़ से ज्यादा है। इसमें करीब सत्ताईस करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे (बीपीएल) जीवनयापन करते हैं।

Author Updated: September 10, 2019 4:47 AM
सांकेतिक तस्वीर।

पंकज चतुर्वेदी
चिकित्सा सेवा के मामले में भारत के हालात श्रीलंका, भूटान और बांग्लादेश से भी बदतर हैं। अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य पत्रिका ‘लांसेट’ की ताजा रिपोर्ट ‘ग्लोबल बर्डन आफ डिजीज’ में बताया गया है कि स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में भारत दुनिया के एक सौ पनच्यानवे देशों की सूची में एक सौ पैंतालीसवें स्थान पर है। रिपोर्ट कहती है कि भारत ने सन 1990 के बाद अस्पतालों की सेहत में सुधार तो किया है, लेकिन मरीजों की सेहत नहीं सुधर रही है। हमारे देश की जनसंख्या सवा सौ करोड़ से ज्यादा है। इसमें करीब सत्ताईस करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे (बीपीएल) जीवनयापन करते हैं। इनमें से अनुसूचित जनजाति (एसटी) के 45.3 फीसद और अनुसूचित जाति (एससी) 31.5 फीसद लोग इस रेखा के नीचे आते हैं। इसकी जानकारी केंद्र सरकार ने कुछ महीनों पहले लोकसभा में दी थी। सरकार ने लोगों की जिंदगी में सुधार और गरीबी खत्म करने के लिए कई कदम उठाए हैं, लेकिन फिर भी न तो गरीबी मिट रही है और न ही भूख से मौत की घटनाएं थम रही हैं। बल्कि दोनों में इजाफा ही हो रहा है। असलियत यह है कि हर दिन हजारों लोग अपनी जमीन, गहने या जरूरी सामान बेच कर अपने प्रियजन का इलाज करवाते हैं और अच्छा खाता-पीता परिवार देखते ही देखते गरीब हो जाता है।

अभी बरसात विदा होने वाली है और यह मच्छरों के प्रकोप का काल है। दूरदराज के गांव-कस्बों से लेकर महानगरों तक के अस्पताल डेंगू और मलेरिया जैसी मच्छरजनित बीमारियों के मरीजों से अटे पड़े हैं। प्लेटलेट्स कम होने, तेज बुखार या जोड़ों के दर्द का ऐसा खौफ है कि लोग अपने घर के बर्तन बेच कर भी पचास हजार रुपए तक खर्च कर रहे हैं। कुछ सौ रुपए खर्च कर मच्छर नियंत्रण से जिन बीमारियों को रोका जा सकता था, औसतन सालाना बीस लाख लोग इनकी चपेट में आकर इलाज पर अपनी गाढ़ी मेहनत की कमाई लुटाने को मजबूर हैं।

स्वास्थ्य के मामले में भारत की स्थिति दुनिया में शर्मनाक है। चिकित्सा सेवा के मामले में भारत के हालात श्रीलंका, भूटान और बांग्लादेश से भी बदतर हैं। अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य पत्रिका ‘लांसेट’ की ताजा रिपोर्ट ‘ग्लोबल बर्डन आफ डिजीज’ में बताया गया है कि स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में भारत दुनिया के एक सौ पनच्यानवे देशों की सूची में एक सौ पैंतालीसवें स्थान पर है। रिपोर्ट कहती है कि भारत ने सन 1990 के बाद अस्पतालों की सेहत में सुधार तो किया है, लेकिन मरीजों की सेहत नहीं सुधर रही है। उस साल भारत को 24.7 अंक मिले थे, जबकि 2016 में ये बढ़ कर 41.2 हो गए हैं। देश के आंचलिक कस्बों की बात तो दूर, राजधानी दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) या सफदरजंग जैसे अस्पतालों की भीड़ और आम मरीजों की दुर्गति किसी से छिपी नहीं है।
एक तो हम जरूरत के मुताबिक डाक्टर तैयार नहीं कर पा रहे, दूसरा देश की बड़ी आबादी न तो स्वास्थ्य के बारे में पर्याप्त रूप से जागरूक है और न ही उसके पास आकस्मिक चिकित्सा के हालात में बीमा जैसी कोई सुविधा या धन की व्यवस्था रहती है। हालांकि सरकार गरीबों के लिए मुफ्त इलाज की कई योजनाएं चलाती है, लेकिन व्यापक अशिक्षा और जानकारी के अभाव में ऐसी योजनाएं लाभकारी साबित नहीं हो पातीं। पिछले सत्र में ही सरकार ने संसद में स्वीकार किया कि देश में आठ लाख से ज्यादा डॉक्टर काम कर रहे हैं। एक अरब तैंतीस करोड़ की आबादी के हिसाब से तो औसतन प्रति हजार व्यक्ति पर एक डॉक्टर का आंकड़ा भी बहुत दूर लगता है। फिर, मेडिकल की पढ़ाई इतनी महंगी कर दी है कि जो भी बच्चा डॉक्टर बनेगा, उसकी मजबूरी होगी कि वह दोनों हाथों से केवल नोट कमाए।

पब्लिक हैल्थ फाउंडेशन आफ इंडिया (पीएचएफआइ) की एक रिपोर्ट बताती है कि सन 2017 में देश के साढ़े पांच करोड़ लोगों के लिए स्वास्थ्य पर किया गया व्यय आउट आफ पाकेट (ओओपी) यानी क्षमता से अधिक व्यय की सीमा से पार रहा। यह संख्या दक्षिण कोरिया, स्पेन या केन्या की आबादी से अधिक है। इनमें से साठ फीसद यानी तीन करोड़ अस्सी लाख लोग अस्पताल के खर्चों के चलते बीपीएल यानी गरीबी रेखा से नीचे आ गए। बानगी के तौर पर ‘इंडिया स्पेंड’ संस्था द्वारा छत्तीसगढ़ राज्य के पंद्रह जिलों के सौ सरकारी अस्पतालों से केवल एक दिन में लिए गए एक हजार दो सौ नब्बे परचों को लें तो उनमें से अट्ठावन फीसद दवाएं सरकारी अस्पताल में उपलब्ध नहीं थीं। जाहिर है, ये मरीजों को बाजार से अपनी जेब से खरीदनी पड़ीं।

भारत में लोगों की जान और जेब पर सबसे भारी पड़ने वाली बीमारियों में ‘दिल और दिमागी दौरे’ सबसे आगे हैं। भारत के पंजीयक और जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि सन 2015 में दर्ज तिरपन लाख चौहत्तर हजार आठ सौ चौबीस मौतों में से 32.8 फीसद इस तरह के दौरों के कारण हुर्इं। एक अध्ययन के मुताबिक भारत में उच्च रक्तचाप से ग्रस्त लोगों की संख्या सन 2025 तक इक्कीस करोड़ के पार हो जाएगी, जबकि सन 2002 में यह आंकड़ा 11.82 करोड़ था। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के सर्वेक्षण के अनुसार यह वृद्धि ग्रामीण इलाकों में होगी। भारत में हर साल करीब दो लाख लोग उच्च रक्तचाप की वजह से मर रहे हैं। चिंताजनक तथ्य यह है कि अब उन्नीस-बीस साल के नौजवान भी इसका शिकार तेजी से हो रहे हैं। इलाज में सबसे अधिक खर्च दवा पर होता है।

भारत में इस बीमारी के इलाज में एक व्यक्ति को दवा पर अच्छा खासा खर्च करना पड़ता है और यह एक आम आदमी के लिए तनाव का विषय है। इस तरह के रोग पर करीब डेढ़ हजार रुपए हर महीने दवा पर खर्च करने पड़ते हैं। इलाज पर ज्यादा खर्च की चिंता इंसान को मधुमेह और हाइपर थायरायड जैसी बीमारियों की ओर धकेलती है। गरीबी, विषमता और आर्थिक बोझ से दबे लोग उच्च रक्तचाप जैसी बीमारी की चपेट में आकर लुट-पिट रहे हैं।

मधुमेह भी देश में महामारी की तरह फैल रहा है। इस समय भारत में कोई सात करोड़ लोग मधुमेह के शिकार हैं। इनमें बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारी हैं। सरकार का अनुमान है कि हर साल इसके मरीज सवा दो लाख करोड़ की दवाएं खा रहे हैं जो देश के कुल स्वास्थ्य बजट का दस फीसद से ज्यादा है। बीते पच्चीस सालों में भारत में मधुमेह के मरीजों की संख्या में पैंसठ फीसद का इजाफा हुआ है। औसतन प्रति व्यक्ति दस हजार रुपए सालाना इसकी जांच और दवा पर खर्च होता है। समस्या ज्यादा गंभीर तब हो जाती है जब मधुमेह की वजह से किडनी, त्वचा, उच्च रक्तचाप और दिल की बीमारियां भी होने लगती हैं।

स्वास्थ्य सेवाओं की जर्जरता की बानगी सरकार की सबसे प्रीमियम स्वास्थ्य योजना सीजीएचएस यानी केंद्रीय कर्मचारी स्वास्थ्य सेवा योजना है। इसके तहत पंजीकृत लोगों में चालीस फीसद मरीज मधुमेह के हैं और वे हर महीने केवल नियमित दवा लेने जाते हैं। एक मरीज की औसतन हर दिन की पचास रुपए की दवा। वहीं, स्टेम सेल से मधुमेह के स्थायी इलाज का खर्च महज सवा से दो लाख है, लेकिन सीजीएचएस में यह इलाज शामिल नहीं है। ऐसे ही कई अन्य रोग हैं जिनकी आधुनिक चिकित्सा उपलब्ध है लेकिन सीजीएचएस में उसे शामिल नहीं किया गया।

विभिन्न राज्यों में गरीबों को कार्ड देकर निजी अस्पताल में मुफ्त इलाज की अधिकांश योजनाएं निजी अस्पतालों का खजाना भरने का जरिया बनी हैं, इसके विपरीत गरीब कंगाल हो रहा है। महज पान मसाला-गुटखे या शराब के कारण देश में लाखों परिवार फटेहाल होते हैं। लेकिन सरकार राजस्व के लालच में इन पर पाबंदी लगाने से डरती है। गंभीरता से देखें तो इन व्यसनों से उपजी बीमारियों के इलाज में लगा धन व संसाधन राजस्व से हुई कमाई से ज्यादा ही होते हैं।

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