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कबाड़ का कारोबार

अदालत की सख्ती के चलते करीब पंद्रह साल पहले प्रदूषण फैलाने वाले और अवैध रूप से चल रहे कारखानों को दिल्ली से बाहर बसाने का अभियान चला था। इसके लिए हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में औद्योगिक क्षेत्र विकसित किए गए थे।

Author February 4, 2019 3:05 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर (Express Photo by Karma Sonam Bhutia)

अदालत की सख्ती के चलते करीब पंद्रह साल पहले प्रदूषण फैलाने वाले और अवैध रूप से चल रहे कारखानों को दिल्ली से बाहर बसाने का अभियान चला था। इसके लिए हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में औद्योगिक क्षेत्र विकसित किए गए थे। दिल्ली से उजड़ कर जाने वाली औद्योगिक इकाइयों को इन इलाकों में रियायती दर पर भूखंड आबंटित किए गए थे। मगर बहुत सारे कारखाने चोरी-छिपे, नियम-कायदों को तोड़-मरोड़ कर व्याख्यायित करते हुए या प्रशासन की मिलीभगत से दिल्ली के भीतर बने रहे। ज्यादातर कल-कारखाने दिल्ली के शहरी क्षेत्र में आ गए गांवों या लाल डोरा के भीतर चलते हैं, क्योंकि उनमें शहरी क्षेत्र के नियम-कायदे लागू नहीं होते। उन्हें भवन निर्माण आदि के मामले में छूट मिली हुई है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि इन क्षेत्रों में प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयां लगाने या ऐसे कारोबार करने की छूट है। कबाड़ का कारोबार करने वाले भी इसी तरह छूट लेते रहे हैं।

इसके मद्देनजर राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी एनजीटी ने दिल्ली सरकार को भारी वाहनों को काट कर कबाड़ निकालने वालों के खिलाफ कदम उठाने का निर्देश दिया था, पर वह इस मामले में विफल रही। इस पर एनजीटी ने दिल्ली सरकार को फटकार लगाते हुए कहा है कि सरकार पांच करोड़ रुपए जमानत राशि जमा कराए और गारंटी दे कि वह एक महीने के भीतर इस काम को पूरा कर लेगी। भारी वाहनों को काट कर कबाड़ निकालने का कारोबार शहर के कुछ इलाकों में बड़े पैमाने पर होता है। उनमें मायापुरी भी एक है। इन इलाकों में रिहाइशी कॉलोनियां हैं। इस तरह कबाड़ निकालने की प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर प्रदूषण फैलता है, जो वहां रहने वाले लोगों की सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

मगर समझना मुश्किल है कि इस तरह के कारोबार को हटाने में दिल्ली सरकार को क्या परेशानी हो सकती है। इसमें न तो भारी मशीनों का उपयोग होता है और न इस कारोबार को उत्पादन का कोई भारी नुकसान उठाना पड़ता है। बस इन्हें एक जगह से दूसरी जगह विस्थापित करने की प्रक्रिया पूरी करनी होती है। फिर जब वे अवैध रूप से चल रहे हैं, तो उन्हें कहीं और जमीन मुहैया कराने की औपचारिकता भी नहीं निभानी होती। मगर सरकार ऐसे लोगों को नहीं हटा सकती, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि अवैध रूप से चल रहे चप्पल-जूते के कारखानों, प्लास्टिक-रबड़ और इस्पात से बनने वाली वस्तुओं के कारखानों आदि पर नकेल कसने में कहां तक सफल हो सकती है।

दिल्ली के भीतर ऐसे अवैध रूप से चल रहे कारखानों में हर साल कोई न कोई बड़ा हादसा हो जाता है, जिसमें मजदूरों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है। तब सरकार कमर कसती है कि वह इन कारखानों पर नकेल कसेगी। मगर फिर से वही प्रशासनिक शिथिलता नजर आने लगती है। दिल्ली में प्रदूषण का स्तर जानलेवा स्तर तक पहुंच चुका है। इससे पार पाने के लिए दिल्ली सरकार ने कई उपाय आजमाए, पर वे हवाई ही साबित हुए। अवैध रूप से चल रहे कारखानों को हटाने के निर्देश कई बार दिए जा चुके हैं। उनसे निकलने वाले जहरीले पानी और धुएं की वजह से किस कदर यमुना का पानी और शहर की हवा प्रदूषित हो रही है, अनेक अध्ययनों से जाहिर हो चुका है। पर हैरानी की बात है कि दिल्ली सरकार प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों के प्रति इस तरह नरम रवैया क्यों अख्तियार किए हुई है।

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