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संपादकीय: अशांति का रास्ता

अफगानिस्तान की सत्ता पर तालिबान की पकड़ मजबूत होने का मतलब है वहां पाकिस्तान की ताकत भी बढ़ेगी।

Author Published on: September 10, 2019 5:06 AM
सांकेतिक तस्वीर।

तालिबान और अमेरिका के बीच शांति वार्ता का टूटना अफगानिस्तान के लिए फिर एक बुरे दौर की वापसी का संकेत है। अब तक यह उम्मीद बनी हुई थी कि आने वाला वक्त अफगान लोगों के लिए जल्द ही कोई अच्छी खबर लेकर आने वाला होगा। लेकिन अब इन उम्मीदों पर पानी फिर गया लगता है। तालिबान हिंसा के जिस रास्ते पर बढ़ चुका है, उसमें अब शांति की उम्मीद करना व्यर्थ है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कैंप डेविड में होनी वाली अफगान शांति वार्ता के अंतिम दौर से अचानक हट जाने का जो कड़ा फैसला कर डाला, वह तालिबान के लिए कड़ा संदेश है। इससे यह भी साफ हो गया है कि अमेरिका तालिबान की हिंसा के आगे झुकेगा नहीं और उसे सबक सिखाने की रणनीति पर ही चलेगा। ट्रंप के शांति वार्ता तोड़ने के बाद तालिबान ने अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों पर और ज्यादा हमले की धमकी दी है। अगर तालिबान के हमले में एक अमेरिकी सैनिक के मारे जाने पर ट्रंप शांति वार्ता तोड़ने जैसा कड़ा रुख अपनाते हैं तो और ज्यादा हमले होने पर वे तालिबान के प्रति क्या रुख अपनाएंगे, यह देखने की बात होगी।

अफगानिस्तान पिछले कई दशकों से युद्ध का अखाड़ा बना हुआ है। अमेरिका और रूस दोनों ने यहां जिस तरह की अशांति को जन्म दिया था, उसी का नतीजा है कि अब तालिबान का सफाया किसी के भी वश में नहीं रह गया है। इसीलिए आधे अफगानिस्तान में तालिबान का राज है। युद्ध से लेकर कूटनीति तक तालिबान को परास्त करने में नाकाम रही है। तालिबान का आतंक पहले अफगानिस्तान तक सीमित था, लेकिन पाकिस्तान जैसे मुल्क ने तालिबान का भी अलग नेटवर्क खड़ा करवा दिया। इसलिए अब अमेरिका, भारत, अफगानिस्तान और आसपास के मुल्कों के समक्ष बड़ी चुनौती यह है कि कैसे तालिबान का सफाया हो।

यह किसी से छिपा नहीं है कि तालिबान की असली ताकत के पीछे मुख्य रूप से पाकिस्तान है। अमेरिका ने पिछले चार दशकों में अफगानिस्तान में अपने सैकड़ों सैनिक खोए हैं और अरबों डॉलर का नुकसान किया है। इसलिए ट्रंप आगामी राष्ट्रपति चुनाव से पहले किसी भी कीमत पर अमेरिकी सैनिकों की वापसी करा लेना चाहते हैं। इसका वे वादा भी कर चुके हैं। इसलिए वे पाकिस्तान की मदद से तालिबान को वार्ता की मेज पर लाकर उसे काबुल की सत्ता में भागीदार बनाने की रणनीति पर चल रहे थे। लेकिन तालिबान ने अपने पैरों कुल्हाड़ी मार ली है।

अफगानिस्तान के लिए आने वाला वक्त संकटों से भरा है। वहां इस महीने के आखिर में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं। अगर शांति समझौता हो जाता तो तालिबान के लिए अफगानिस्तान की सत्ता का रास्ता आसान हो जाता। अफगानिस्तान की सत्ता पर तालिबान की पकड़ मजबूत होने का मतलब है वहां पाकिस्तान की ताकत भी बढ़ेगी। यह स्थिति भारत के हितों के प्रतिकूल है। पिछले दो दशकों में भारत ने अफगानिस्तान के विकास में हर तरह से बड़ा योगदान दिया है, अरबों रुपए की परियोजनाएं वहां चल रही हैं।

ऐसे में तालिबान का सत्ता में आना भारत के लिए किसी अशुभ से कम नहीं होता। और भारत के लिए सबसे ज्यादा मुश्किल तो यह होगी कि कश्मीर में अशांति के लिए पाकिस्तान तालिबान का जमकर इस्तेमाल करेगा। तालिबान पहले भी कश्मीर में आतंक फैलाता रहा है। ट्रंप बखूबी समझते हैं कि तालिबान हिंसा का रास्ता नहीं छोड़ेगा। हालांकि झटका तो उन्हें भी लगा है, लेकिन वार्ता तोड़ कर उन्होंने एक तरह से तालिबान को सबक ही सिखाया है।

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