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संपादकीय: पाक को झटका

जम्मू-कश्मीर में धारा 370 को निष्प्रभावी कर दिए जाने के बाद ही पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष से इस मसले पर बैठक बुलाने की मांग की थी। लेकिन तब पाकिस्तान की यह मांग खारिज कर दी गई थी।

imran khanपाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान। (रॉयटर्स फोटो)

जम्मू-कश्मीर में धारा 370 को बेअसर किए जाने के भारत सरकार के फैसले से बौखलाए पाकिस्तान और उसके हमदर्द चीन को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जिस तरह से मुंह की खानी पड़ी है, वह इन दोनों राष्ट्रों के लिए बड़ा झटका है। पाकिस्तान और चीन को अब समझ जाना चाहिए कि कश्मीर मुद्दे पर अनर्गल प्रलाप करके दुनिया को अपने पक्ष में करने की कोशिशों और भारत के खिलाफ अभियान छेड़ने से कुछ हासिल नहीं होने वाला। इस वक्त पाकिस्तान का एकमात्र मकसद यही है कि किसी भी तरह से कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण किया जाए और सहानुभूति बटोरी जाए। लेकिन सुरक्षा परिषद के चार स्थायी (चीन को छोड़) और दस अस्थायी सदस्य देशों ने ऐसा कुछ नहीं कहा है जिससे चीन और पाकिस्तान की किसी बात को बल मिलता हो। इसलिए यह दोनों देशों की एक तरह से कूटनीतिक हार है। पाकिस्तान के विदेशमंत्री ने तो पिछले हफ्ते कहा ही था कि कश्मीर के मुद्दे पर सुरक्षा परिषद में और इसलामिक देशों का समर्थन जुटाना आसान नहीं है। अभी तक न तो इसलामिक देशों का संगठन (ओआइसी) खुल कर पाकिस्तान के पक्ष में उतरा है न इंडोनेशिया जैसा मुसलिम बहुल देश। इससे यह तो साफ है कि अंतरराष्ट्रीय बिरादरी इस बात को बखूबी समझती है कि कश्मीर मामला भारत और पकिस्तान के बीच का द्विपक्षीय मसला है।

जम्मू-कश्मीर में धारा 370 को निष्प्रभावी कर दिए जाने के बाद ही पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष से इस मसले पर बैठक बुलाने की मांग की थी। लेकिन तब पाकिस्तान की यह मांग खारिज कर दी गई थी। इसके बाद चीन ने अपना पैंतरा चला और कश्मीर मुद्दे पर बैठक बुलाने की मांग की। दरअसल, चीन भारत के इस फैसले से परेशान इसलिए है क्योंकि लद्दाख को भी अब केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया है और यह इलाका सामरिक दृष्टि से बहुत ही संवेदनशील है। चीन यहां दबदबा बनाए रखना चाहता है लेकिन अब उसके लिए यहां अपनी गतिविधियां बढ़ाना आसान नहीं होगा। जम्मू-कश्मीर को लेकर भारत का ताजा कदम जिस तरह पाकिस्तान के लिए कड़ा संदेश है, उसी तरह का संदेश चीन के लिए भी है।

हालांकि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की इस बैठक का कोई नतीजा इसलिए नहीं निकलना था क्योंकि यह एक अनौपचारिक बैठक मात्र थी जिसमें सदस्य देश सिर्फ मौजूदा हालात पर बात भर करते हैं, लेकिन कोई फैसला, मतदान जैसी बात नहीं होती। न ही इस तरह की बैठकों का कोई ब्योरा दर्ज होता है, न बैठक के बाद बयान जारी होता है। कुल जमा यह दिखावे की बैठक से ज्यादा कुछ नहीं थी। फिर भी पाकिस्तान इस खुशफहमी में है कि वह चीन की मदद से इस मामले को यहां तक ले आया। पर उसे यह भी नहीं भूलना चाहिए कि बैठक के बाद सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष ने साफ कह दिया कि पाकिस्तान द्वारा कश्मीर मुद्दा संयुक्त राष्ट्र में उठाने का कोई आधार नहीं है। इस बार भी उसकी बातों में कोई दम नहीं था। हैरानी की बात तो यह है कि धारा 370 पर आए फैसले पर चीन ने प्रतिक्रिया देते हुए इसे भारत का अंदरूनी मामला करार दिया था और इस बात के संकेत भी थे कि इस मुद्दे पर वह सुरक्षा परिषद की बैठक बुलाने जैसा कदम नहीं उठाएगा। लेकिन जैसी उसकी फितरत रही है, वह सुरक्षा परिषद पहुंच गया भले पाकिस्तान के दबाव में उसने यह दांव चला हो। हकीकत यह है कि भारत चीन के साथ संतुलन बनाने की कितनी ही कोशिश क्यों न करे, चीन देता पाकिस्तान का ही साथ है। लेकिन इस बार दोनों की जुगलबंदी पिट गई है। भारत के लिए यह बड़ी सफलता है।

 

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