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दोहरेपन की नीति

ओआइसी के मंच से कश्मीर मसले को उठाया जाना बता रहा है कि भले पाकिस्तान ने इस बैठक बहिष्कार किया हो, लेकिन उसका दबदबा कम नहीं हुआ और वह अपने मकसद में कामयाब रहा।

Author March 5, 2019 3:36 AM
ओआईसी के कार्यक्रम पहुंची थीं विदेश मंत्री (फोटोः एजेंसियां)

हाल में अबु धाबी में हुए इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआइसी) के विदेश मंत्रियों के सम्मेलन में भारत को आमंत्रित कर इस संगठन ने यह संदेश दिया था कि बदलते वक्त के साथ वह भी बदल रहा है और इसका दायरा सिर्फ मुसलिम देशों तक सीमित नहीं रहेगा। इसलिए पाकिस्तान के कड़े विरोध और बहिष्कार के बावजूद विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में भारत को बुलाया गया। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने इसके लिए पहल की थी। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इस मंच से आतंकवाद फैलाने वालों को चेताया। भारत के लिए यह बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि थी कि ओआइसी ने पाकिस्तान के विरोध को कोई तवज्जो नहीं दी और भारत को अपने मंच से बात रखने का मौका दिया। लेकिन भारत की इस कामयाबी को उस वक्त बड़ा धक्का लगा जब सम्मेलन की समाप्ति पर जो प्रस्ताव जारी किया गया, उसमें कश्मीर मसले को उठाया गया। इस प्रस्ताव में कश्मीर को लेकर भारत के रुख की आलोचना की गई है और भारत पर आरोप लगाया गया है कि वह कश्मीरियों के खिलाफ बल प्रयोग कर रहा है और उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन कर रहा है।

भारत को यह उम्मीद नहीं रही होगी कि जो ओआइसी उसे सम्मान और सदाशयता के तौर पर आमंत्रित कर रहा है, वह पीछे से उसे घेरने की किसी रणनीति पर भी चल सकता है। ओआइसी के मंच से कश्मीर मसले को उठाया जाना बता रहा है कि भले पाकिस्तान ने इस बैठक बहिष्कार किया हो, लेकिन उसका दबदबा कम नहीं हुआ और वह अपने मकसद में कामयाब रहा। अगर पाकिस्तान इस बैठक में होता तो भी कश्मीर का मुद्दा उठाने से वह नहीं चूकता। सिर्फ ओआइसी नहीं, हर वैश्विक मंच से पाकिस्तान कश्मीर को लेकर राग अलापता रहा है। ओआइसी में कश्मीर मुद्दा उठा है और इस पर पाकिस्तान का समर्थन किया गया है तो इसका सीधा-सीधा मतलब यही है कि सत्तावन देश इस मसले पर किसी न किसी रूप में पाकिस्तान के साथ हैं। वे उसी भाषा और रुख का समर्थन करेंगे जो पाकिस्तान का होगा। साफ है कि इससे ओआइसी में पाकिस्तान के खिलाफ भारत की बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि का वजन थोड़ा कम हुआ है।

ऐसे में ओआइसी के रुख पर भारत की नाराजगी स्वाभाविक ही है। भारत ने दो-टूक कह दिया है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और यह मुद्दा भारत की आंतरिक सुरक्षा से संबंधित है। ओआइसी की बैठक में भारत को बुलाया जाना इस बात का संकेत माना जा रहा था कि आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को एक कड़ा संदेश दिया जा रहा है। लेकिन ओआइसी के प्रस्ताव में पाकिस्तान की भाषा है। स्पष्ट है कि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश भारत के साथ अच्छे रिश्तों का सिर्फ दिखावा कर रहे हैं और हकीकत से मुंह मोड़ रहे हैं।

क्या ओआइसी इस बात से अनजान है कि पाकिस्तान पिछले तीन दशकों से भारत के खिलाफ आतंकवाद को शह देना जारी रखे हुए है और अपने यहां पल रहे आतंकी संगठनों से भारत पर बड़े-बड़े आतंकी हमले करा चुका है। जब सऊदी अरब का सबसे करीबी सहयोगी अमेरिका भी आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को चेतावनी देता रहा है तो ओआइसी को क्यों नहीं पाकिस्तान के खिलाफ कदम उठाना चाहिए? इससे ओआइसी के दोहरेपन की नीति का पता चलता है कि एक ओर वह भारत को अहमियत देने का संदेश दे रहा है, दूसरी ओर भीतर से पाकिस्तान के साथ है। कश्मीर पर भारत के खिलाफ जो रुख इस सम्मेलन में अपनाया गया है, वह पीछे से वार करने की साजिश से कम नहीं माना जा सकता।

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