ताज़ा खबर
 

संपादकीय: विकल्प का सम्मान

सन 1998 में अमर्त्य सेन को अर्थशास्त्र में गरीबी उन्मूलन की दिशा में ही काम करने के लिए नोबेल सम्मान मिलने के इक्कीस सालों बाद यह दूसरा मौका है जो भारत के लिए खास और अहम है।

Author Published on: October 16, 2019 1:55 AM
नोबेल समिति ने उनके योगदान के बारे में कहा कि इन तीनों ही अर्थशास्त्रियों के प्रयोगधर्मी दृष्टिकोण ने पिछले कई दशकों में विकास अर्थशास्त्र के स्वरूप को बदला है।

इस साल का अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार यह दर्शाता है कि अर्थव्यवस्था के तकाजे के हवाले से गरीबों और वंचितों के सवाल किसी न किसी बहाने तात्कालिक रूप से पीछे छोड़ देने की दलील के बरक्स बेहतर संकल्पनाएं मौजूद हैं। अब निश्चित रूप से फिर इस सिरे से अर्थव्यवस्था का विश्लेषण होगा और चुनौतियों का हल निकालने की कोशिश होगी। अभिजित बनर्जी, एस्थर डफ्लो और माइकल क्रेमर को संयुक्त रूप से मिला नोबेल पुरस्कार दरअसल विकास के अर्थशास्त्र को फिर से जीवित करने में उनके योगदान के लिए दिया गया है। अर्थव्यवस्था की सतही चकाचौंध के बरक्स इन प्रयोगधर्मी अर्थशास्त्रियों ने यह साबित किया कि दुनिया भर में पसरी गरीबी से छोटे और ज्यादा सटीक सवालों के जरिए कैसे निपटा जा सकता है।

नोबेल समिति ने उनके योगदान के बारे में कहा कि इन तीनों ही अर्थशास्त्रियों के प्रयोगधर्मी दृष्टिकोण ने पिछले कई दशकों में विकास अर्थशास्त्र के स्वरूप को बदला है। उनके अध्ययनों और प्रयोगों के निष्कर्षों के जरिए खासतौर पर गरीब और मध्य आय वाले देशों में नीति निर्माण में काफी मदद मिल सकती है। इन तीनों ने ही गरीबी, असमानता और जनकल्याण जैसे समान विषयों पर शोध किए हैं जो तीसरी दुनिया के देशों के लिए बेहद अहम साबित हो सकते हैं।

सन 1998 में अमर्त्य सेन को अर्थशास्त्र में गरीबी उन्मूलन की दिशा में ही काम करने के लिए नोबेल सम्मान मिलने के इक्कीस सालों बाद यह दूसरा मौका है जो भारत के लिए खास और अहम है। दरअसल, अभिजित बनर्जी भारतीय मूल के हैं जिन्होंने दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पढ़ाई की है। एक अन्य खास बात यह भी है कि अर्थशास्त्र में इस साल की नोबेल तिकड़ी में अभिजित बनर्जी और एस्थर डफ्लो पति-पत्नी भी हैं। इन्होंने अपने प्रयोगों के जरिए यह साबित किया कि गरीबी के मुद्दे पर बड़ी-बड़ी बहसों के बजाय अगर गरीबी को दूर करने के लिए लघुस्तरीय कार्यक्रमों को व्यापक पैमाने पर अंजाम दिया जाए तो वह ज्यादा उपयोगी है।

अगर गरीब तबकों के बीच शिक्षा, पोषण और टीकाकरण जैसे कामों को मुख्य केंद्र बनाने के साथ-साथ लोगों को थोड़ी सहायता दी जाए तो ऐसे कार्यक्रमों में अपेक्षा से अधिक कामयाबी दर्ज की जा सकती है। मसलन, एक प्रयोग के तहत इन अर्थशास्त्रियों ने प्रोत्साहन के तौर पर सिर्फ दाल का इस्तेमाल करके राजस्थान के एक इलाके में टीकाकरण के कार्यक्रम को सफलता से पूरा किया।

आधुनिक विश्व में बाजार को सबसे बड़ी ताकत माना जाता है और किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को उसकी मजबूती और कमजोरी का एक सबसे अहम पहलू। दुनिया भर में अब इसी केंद्र के इर्द-गिर्द न केवल विकास से संबंधित गतिविधियां चल रही हैं, बल्कि राजनीति भी इसी से प्रभावित होती है। लेकिन इसी के समांतर ऐसे सवाल भी उठते रहे हैं कि किसी लोकतांत्रिक देश में अर्थव्यवस्था केंद्रित विकास में अगर अमीरों और गरीबों के बीच की खाई बढ़ती जा रही है तो ऐसा क्यों है और आखिर इसकी वजहें क्या हैं! इसका जवाब केवल विकास के ‘संक्रमणकाल’ या फिर धीरे-धीरे रिस कर वंचित तबकों तक पहुंचने के आश्वासन भर से नहीं ढूंढ़ा जा सकता है।

इसके लिए प्रयोगात्मक और ठोस नतीजे देने वाले उदाहरणों की जरूरत पड़ेगी, खासतौर पर जब विकासशील देशों में उदारीकरण और मुक्त बाजार के दौर में अमीरी-गरीबी की खाई के लगातार बढ़ते जाने की समस्या गहराती जा रही हो। ऐसे में इस साल अर्थशास्त्र के संयुक्त रूप से नोबेल पुरस्कार विजेताओं ने अर्थव्यवस्था और उसकी इस समस्या और उसकी जटिलताओं की पहचान करके उसके समाधान का विकल्प भी सामने रखा है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 संपादकीय: कुर्दों पर हमले
2 संपादकीय: बिगड़ती हवा
3 संपादकीय: मंदी की मार