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संपादकीय: कुपोषण की मार

कुपोषण का मुद्दा सरकारों के लिए प्राथमिकता और चिंता का विषय ही नहीं रहा। आज नतीजा सामने है कि हमारी भावी पीढ़ी अपने जीवन के गंभीर संकट से दो-चार हो रही है।

Author Published on: November 4, 2019 2:02 AM
भारत ने बच्चों को 2022 तक कुपोषण से मुक्त करने का लक्ष्य तय किया है।

देश में अगर बच्चे कमजोर होने लगें, बीमार रहने लगें तो हमारी भावी पीढ़ी कैसी होगी, इसकी कल्पना कर पाना भी मुश्किल है। व्यापक राष्ट्रीय पोषण सर्वे की हाल में जो रिपोर्ट आई है, वह हमारी भावी पीढ़ी की खौफनाक तस्वीर पेश करती है। साल 2016 से 2018 के दौरान दस से उन्नीस साल के बीच के किशोर लड़के-लड़कियों पर कराए गए सर्वे में यह सामने आया है कि अस्सी फीसद किशोर आबादी में पोषक तत्वों की भारी कमी है और इसका नतीजा यह हो रहा है कि बीस साल के होने के पहले ही ये बच्चे किसी न किसी गंभीर रोग का शिकार बनते जा रहे हैं। यह समाज और खासकर सरकार के लिए गंभीर चिंता का विषय है। जाहिर है, पिछले सत्तर सालों में स्वास्थ्य क्षेत्र खासकर महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य की घोर उपेक्षा की गई। सबसे हैरत भरी बात तो यह है कि आजादी के बाद देश में पहली बार इस तरह का कोई सर्वे हुआ जिसमें बच्चों के शारीरिक स्वास्थ्य की हकीकत सामने आई है। अगर बच्चे पोषक तत्वों की कमी से जूझेंगे तो फिर इससे मानसिक विकास प्रभावित होगा।

कुपोषण का मुद्दा सरकारों के लिए प्राथमिकता और चिंता का विषय ही नहीं रहा। आज नतीजा सामने है कि हमारी भावी पीढ़ी अपने जीवन के गंभीर संकट से दो-चार हो रही है। भारत में दस से उन्नीस साल के बीच की किशोरवय आबादी पंद्रह करोड़ के करीब है, जिसमें साढ़े छह करोड़ लड़कियां और आठ करोड़ से ज्यादा लड़के हैं। सर्वे बताता है कि इसमें से आधे लड़के-लड़कियां या तो सामान्य कद से कम के यानी ठिगने हैं, या सामान्य से काफी कम या काफी ज्यादा वजन वाले हैं। सबसे चिंताजनक पहलू तो यह है कि अस्सी फीसद बच्चे आयरन, फोलेट, जिंक, विटामिन ए, विटामिन बी12 और विटामिन डी की कमी से पीड़ित हैं। इसका मतलब साफ है कि जो बढ़ती उम्र में इन्हें जैसा पौष्टिक भोजन मिलना चाहिए, वैसा नहीं मिल रहा। इसके अलावा, शहरी इलाकों में जीवनशैली और खानपान जिस तेजी से बदला है, उससे भी कम उम्र के बच्चे और किशोर गंभीर समस्याओं में घिर गए हैं। आजकल के खानपान में जंक फूड और शीतलपेय जिस तरह से हावी हो गए हैं, उसका नतीजा यह हुआ है कि किशोरों में मधुमेह और दिल संबंधी बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ा है। लेकिन ज्यादातर परिवारों में स्थिति यह है कि बच्चों की खानपान संबंधी आदतों पर ध्यान नहीं दिया जाता और वे पौष्टिक भोजन के बजाय हानिकारक खाद्य पदार्थों के सेवन के आदी होते जा रहे हैं।

भारत ने बच्चों को 2022 तक कुपोषण से मुक्त करने का लक्ष्य तय किया है। लेकिन राष्ट्रीय पोषण सर्वे की रिपोर्ट ने जो तस्वीर सामने रखी है, उसे देखते हुए यह लक्ष्य हासिल कर पाना संभव नहीं लगता। जिस देश में इस तरह का सर्वे ही पहली बार हुआ हो, जहां आज भी स्वास्थ्य सेवाएं बीमार हालत में हों, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच गरीबों से दूर हो, ग्रामीण इलाके प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक के मोहताज हों, वहां बच्चों को कैसे पोषक आहार पहुंचाया जाए, यह बड़ी चुनौती है। पोषण अभियान के लक्ष्य भले कुछ भी निर्धारित कर दिए जाएं, लेकिन आज के हालात में इन्हें हासिल करना बड़ी चुनौती है।

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