ताज़ा खबर
 

संपादकीय: हादसे का पुल

विडंबना यह है कि न तो अपने यहां समय पर सावधानी बरतने, हादसे से बचने के लिए कमजोर हो चुके पुलों की मरम्मत करने या फिर उन्हें तोड़ कर नया बनाने को लेकर कोई सजगता दिखती है, न हादसा हो जाने पर ईमानदारी से अपनी गलती स्वीकार करने की प्रवृत्ति है।

Author Updated: March 16, 2019 3:07 AM
आतंकी अजमल आमिर कसाब और मुंबई फुट ओवर ब्रिज हादसा, फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

मुंबई में एक पैदल पार पुल के ढह जाने से छह लोगों की मौत और तीस से ज्यादा लोगों के घायल होने की घटना से फिर यही साबित हुआ है कि आम लोगों के रोजाना जोखिम से गुजरने को लेकर हमारी सरकारों और संबंधित महकमों के भीतर शायद संवेदनशीलता का घोर अभाव है। इतना तय है कि इस पुल में लंबे समय से क्षरण हो रहा होगा, जो गुरुवार को उस समय गिर गया, जब शाम को भारी भीड़ उस पर से गुजर रही थी। गनीमत यह रही कि जिस वक्त यह पुल गिरा, तब वहां यातायात संकेतक की वजह से वाहन रुके हुए थे। वरना मरने वालों की तादाद शायद काफी होती। सवाल है कि जिस पुल से होकर रोजाना हजारों लोग आवाजाही करते हैं, उसके पूरी तरह दुरुस्त होने को लेकर निश्चिंत होने की क्या वजह थी? हादसे के बाद यह तथ्य भी सामने आया कि छह महीने पहले बीएमसी यानी बृहन्नमुंबई नगर पालिका की एक आॅडिट में इस पुल को ‘इस्तेमाल के लिए सुरक्षित’ बताया गया था।

गौरतलब है कि करीब पैंतीस साल पुराने इस पुल की आखिरी बार मरम्मत 2010-11 में की गई थी। उसके बाद स्वच्छ भारत अभियान के तहत पुल के एक हिस्से की सजावट जरूर की गई थी, लेकिन मरम्मत का कोई भी काम नहीं हुआ। अब जब उस पुल के गिरने की वजह से छह लोगों की जान जा चुकी है, तीस से ज्यादा लोग घायल हुए तो इसकी जिम्मेदारी किस पर जानी चाहिए? क्या अब उस आॅडिट की गुणवत्ता या उसमें लापरवाही बरतने वालों को जांच के कठघरे में खड़ा किया जाएगा? विडंबना यह है कि न तो अपने यहां समय पर सावधानी बरतने, हादसे से बचने के लिए कमजोर हो चुके पुलों की मरम्मत करने या फिर उन्हें तोड़ कर नया बनाने को लेकर कोई सजगता दिखती है, न हादसा हो जाने पर ईमानदारी से अपनी गलती स्वीकार करने की प्रवृत्ति है। मुंबई में भी पुल के ढह जाने के बाद एक ओर रेलवे तो दूसरी ओर बीएमसी ने पुल की देखरेख और हादसे के लिए एक-दूसरे पर जिम्मेदारी थोपने की कोशिश की। क्या सचमुच इस तरह की व्यवस्था होती कि किसी निर्माण की देखरेख को लेकर दो या इससे ज्यादा विभागों में अस्पष्टता होती है? फिर बनने के बाद से अब तक उस पुल की मरम्मत या उसके आॅडिट का काम कौन-सा विभाग करता रहा था?

किसी भी हादसे का सबसे अहम सबक यह होना चाहिए कि भविष्य में वे सारे इंतजाम किए जाएं, हर मामले में अतिरिक्त सावधानी बरती जाए, जिससे वैसी घटना दोबारा नहीं हो। लेकिन हमारे यहां ऐसा लगता है कि पुलों की समय-समय पर ठीक से जांच करने और उनके सुरक्षित या असुरक्षित होने के सवाल को गंभीरता से नहीं लिया जाता है। उल्टे हादसे के बाद पर्याप्त संवेदनशीलता भी नहीं दर्शायी जाती है। मुंबई में पुल गिरने की घटना पर सत्ताधारी पार्टी की एक नेता ने यहां तक कह डाला कि पुल गिरने के लिए जिम्मेदार उस पर पैदल चलने वाले लोग हैं। सवाल है कि अलग-अलग महकमों और लोगों में इस स्तर की संवेदनहीनता कहां से आती है? यह कौन बताएगा कि पुल के खतरनाक हालत में और यहां तक कि ढह जाने की स्थिति में होने के बावजूद उसे ‘इस्तेमाल के लिए सुरक्षित’ होने का प्रमाण पत्र किस आधार पर जारी किया गया था, आॅडिट करने वालों की योग्यता क्या थी? या फिर क्या ऐसा भी होता है कि दस्तावेजी खानापूर्ति के मकसद से समय-समय पर इसी तरह की जांच की औपचारिकता पूरी कर दी जाती है और लोगों की जान को जोखिम की हालत में छोड़ दिया जाता है?

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 संपादकीय: खतरे का संकेत
2 संपादकीय: गंगा की गंदगी
3 संपादकीय: दोहरा रुख