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संपादकीय: पहाड़ पर पताका

कुछ साल पहले तक एवरेस्ट पर चढ़ना साहसिक खेल का हिस्सा हुआ करता था, पर अब यह रोमांच का रूप लेता जा रहा है। एवरेस्ट पर पहुंच कर पहाड़ों की सुंदरता को निहारना निस्संदेह जीवन का अद्भुत अनुभव होता होगा।

इस साल तीन सौ इक्यासी लोगों को एवरेस्ट चढ़ाई के लिए परमिट जारी किया गया।

दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी माउंट एवरेस्ट पर पहुंच कर पताका फहराना पर्वतारोहियों के लिए बड़ी उपलब्धि होती है। वहां पहुंचने के लिए पर्वतारोही वर्षों अभ्यास करते हैं। मगर उनमें से बहुतों का एवरेस्ट पर पहुंचने का सपना पूरा नहीं हो पाता। हालांकि अब पर्वतारोहण के लिए इतने तरह के साधन उपलब्ध हो गए हैं, प्रशिक्षण और तकनीक में इतना विकास हुआ है कि हर साल एवरेस्ट पर पहुंच कर पताका फहराने वालों की तादाद कुछ बढ़ी हुई दर्ज होती है। इस साल इस मौसम में रिकार्ड तोड़ आठ सौ पचासी लोग एवरेस्ट पर पहुंचे। पिछले साल आठ सौ सात लोग पहुंचे थे। इस साल वहां अधिक संख्या में लोगों के पहुंचने की वजह से भीड़भाड़ काफी हो गई थी, जिसकी वजह से रास्ता थम गया था। एवरेस्ट पर बढ़ी भीड़ और थमी रफ्तार की खबरें दुनिया भर में सुर्खियां बनी थीं। निस्संदेह इस दुर्गम चोटी पर इतनी बड़ी संख्या में लोगों का पहुंचना बड़ी कामयाबी है। मगर वहां तक पहुंचने में हर साल जिस तरह कुछ पर्वतारोही अपनी जान गंवा बैठते हैं, उसे लेकर चिंता स्वाभाविक है।

कुछ साल पहले तक एवरेस्ट पर चढ़ना साहसिक खेल का हिस्सा हुआ करता था, पर अब यह रोमांच का रूप लेता जा रहा है। एवरेस्ट पर पहुंच कर पहाड़ों की सुंदरता को निहारना निस्संदेह जीवन का अद्भुत अनुभव होता होगा। इसके अलावा इनमें कई लोग ऐसे भी होते हैं, जो बर्फीली चोटियों पर बसने के सपने को साकार करने की संभावनाएं तलाशने जाते हैं। मगर इस यात्रा में कठिनाइयां भी बहुत हैं। हाड़ जमा देने वाली ठंड में कई दिन बिताना सबके वश की बात नहीं। फिर बर्फीली आंधी-तूफान के खतरे हमेशा बने रहते हैं। कई बार ऐसा हो चुका है कि बर्फीली आंधी में दब कर अनेक पर्वातारोही अपनी जान से हाथ धो बैठे। फिर चढ़ाई के दौरान स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां पैदा होने पर वहां इलाज की व्यवस्था करना कठिन है। इस साल हालांकि बर्फीली आंधी जैसी स्थिति नहीं आई, फिर भी सोलह पर्वतारोहियों के मारे जाने की पुष्टि हुई है। पिछले दिनों रास्ते में भीड़ अधिक जमा हो जाने के कारण पर्वतारोहियों को घंटों रुक कर इंतजार करना पड़ा। इसलिए इन खतरों को देखते हुए विशेषज्ञों ने मांग की है कि पर्वतारोहण के लिए अनुमति पत्र जारी करने में कटौती की जाए। साथ ही गाइडों के लिए कड़े मानदंड तय किए जाने चाहिए। देखना है, इसे कितनी गंभीरता से लिया जाता है।

दरअसल, जब से युवाओं में एवरेस्ट पर जाने का आकर्षण बढ़ा है, तब से कई प्रशिक्षण केंद्र इसकी तैयारी कराने लगे हैं। अब पर्वतारोहण संबंधी संसाधन जुटाना भी बहुत सारे लोगों के लिए मुश्किल नहीं रह गया है। इस तरह हर साल अब कुछ ऐसे उत्साही युवा भी एवरेस्ट पर पहुंचने का प्रयास करते देखे जाते हैं, जिन्हें पर्वतारोहण का पर्याप्त अनुभव नहीं है। फिर पर्वतारोहियों के साथ उनका साजो-सामान लेकर चलने वाले और गाइड भी जाते हैं। उनका प्रशिक्षण और योग्यता भी प्रश्नों से बाहर नहीं है। पर्वतारोहण के दौरान आपात स्थिति पैदा होने पर उससे पार पाने में कई लोग विफल साबित होते हैं। इसके अलावा भीड़भाड़ बढ़ने की वजह से एवरेस्ट पर भारी मात्रा में कचरा जमा हो रहा है, जिसके निष्पादन का अब तक कोई कारगर इंतजाम नहीं है। इसलिए एवरेस्ट चढ़ाई को अगर व्यावसायिक रूप देना है तो चीन, भारत और नेपाल सरकारों को मिल कर विशेषज्ञों की चिंता पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

 

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