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संपादकीय: मानसून की फुहार

शायद बरसात ने इस बार जरा ज्यादा ही इंतजार कराने की जिद ठान ली थी। हालांकि मौसम पर नजर रखने वालों ने पहले ही इस बात का इशारा किया था कि मानसून के सफर की रफ्तार इस बार कुछ धीमी है और उसके अपने गंतव्य पर पहुंचने का वक्त थोड़ा आगे बढ़ गया है।

Author July 6, 2019 12:53 AM
साल 2013 में मानसून की रफ्तार सबसे तेज थी जब यह 16 जून तक पूरे भारत में पहुंच गया था। (Express photo by Nirmal Harindran)

यों तो पिछले दो-ढाई महीने से बहुत सारे लोग अलग-अलग वजहों से अपने किसी करीबी का, तो कुछ लोग किसी काम के पूरे होने का इंतजार कर रहे थे। बहुत सारी दूसरी बातों का भी इंतजार हो रहा होगा। लेकिन इस बीच वक्त निकाल कर सबकी आंखें बार-बार आसमान की ओर इस उम्मीद से जरूर देखती रही होंगी कि कहीं-कहीं और कभी-कभार दिखने वाले बादल के टुकड़े कब थोड़ा बरस जाएं और तपती धरती को थोड़ी ठंडक दे जाएं। लेकिन वे बादल जब ठीक से गरज भी नहीं रहे थे तो बरसने का भरम भी कैसे देते! शायद बरसात ने इस बार जरा ज्यादा ही इंतजार कराने की जिद ठान ली थी। हालांकि मौसम पर नजर रखने वालों ने पहले ही इस बात का इशारा किया था कि मानसून के सफर की रफ्तार इस बार कुछ धीमी है और उसके अपने गंतव्य पर पहुंचने का वक्त थोड़ा आगे बढ़ गया है। फिर भी मौसम की मार से जूझते लोग एक-दूसरे से यही खबर लेने में लगे थे कि बादल कब बरसेंगे!

तो इंतजार लंबा खिंचने पर लोग कहीं मायूस न हो जाएं, उससे पहले मानसून ने अपनी हाजिरी दी और बताया कि मौसम की अपनी रफ्तार होती है और वह कभी पहले तो कभी थोड़ी देर से पहुंच सकता है। अब देश के कई हिस्सों में मानसून मेहरबान हो चुका है और न केवल खेती-किसानी के लिए राहत की जमीन बनी है, बल्कि तपती धरती और गरमी से परेशानी में थोड़ा सुकून मिला है। मगर जैसा कि प्रकृति के उतार-चढ़ाव के साथ अच्छा-बुरा अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है, इसने कहीं खुशी की बरसात भेजी है तो कहीं इसकी वजह से जिंदगी मुश्किल हो गई। एक ओर जहां दिल्ली से लेकर समूचे उत्तर भारत में तपते शहरों-महानगरों और गांवों तक में बारिश की फुहार ने राहत और सुकून का अहसास भेजा है तो देश के कुछ हिस्सों से आने वाली खबरों से यही लगता है कि वह बरसात भी क्या, जो रोजमर्रा के जीवन को बाधित कर दे और लोगों के सामने जिंदा रहना एक चुनौती हो जाए!

जाहिर है, मानसून से राहत का अहसास तब तकलीफ में बदल जाता है जब महाराष्ट्र से तीन दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत की खबर आती है। हालांकि ऐसा नहीं है कि मानसून के दौरान अतिवृष्टि के चलते बाढ़ की वजह से तबाही कोई नई बात है। यह तो हमारी सरकारों और समाज के सामने एक ऐसी चुनौती रही है, जो मानसून की आहट से पहले ही उसकी मार का सामना करने की तैयारी कर ले। आखिर जहां समुद्री तूफानों के पहले कुछ तैयारी की गई, वहां बहुत कुछ बचाया जा सका। तो जो मानसून धरती और यहां के समूचे जीव-जगत के सहज जीवन के लिए अनिवार्य है, उसे सकारात्मक असर वाला और राहत का सबब बनाने की कोशिश करने में क्या हर्ज है! शहरी नियोजन से लेकर रोजमर्रा की आम जिंदगी से जुड़ी गतिविधियां और व्यवस्थाएं करते हुए अगर हर बदलते मौसम का ध्यान रखा जाए तो इसकी मुश्किलों के बरक्स राहतें ही ज्यादा हैं। फिर मानसून का इंतजार अच्छा लगेगा और उसके आने की खबर सुकून लेकर आएगी! फिलहाल तो मानसून से रूबरू होने का ही मौका है, वह जिस असर के साथ हो!

 

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