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संपादकीय: निगरानी का सवाल

पीएमसी बैंक में लोगों के जिस तरह से पैसे फंस गए हैं, वह चिंताजनक है।

देश में हजारों की संख्या में सहकारी बैंक चल रहे हैं और इनका नियंत्रण राज्य सरकार के हाथ में होता है। (फोटो- फाइनेंशियल एक्सप्रेस)

मुंबई स्थित पंजाब एंड महाराष्ट्र सहकारी बैंक (पीएमसी बैंक) में घोटाले और अनियमितताओं की परतें अब जिस तरह से खुल रही हैं, उससे ज्यादा हैरानी इसलिए नहीं होनी चाहिए कि भारत की बैंकिंग प्रणाली की असल तस्वीर यही है। ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है। लेकिन अब यह साफ हो चुका है कि बड़ी-बड़ी कंपनियां कर्ज डकार कर बैंकों को खोखला बना रही हैं और आम जनता की गाढ़ी कमाई पर मौज कर रही हैं। भारतीय रिजर्व बैंक अगर ईमानदारी से जांच कराए तो पता चलेगा कि ज्यादातर सहकारी बैंकों में इसी तरह के खेल चल रहे हैं। देश में हजारों की संख्या में सहकारी बैंक चल रहे हैं और इनका नियंत्रण राज्य सरकार के हाथ में होता है।

सहकारी बैंकों के संचालन में नेताओं के दबदबे और हस्तक्षेप भी जगजाहिर हैं। लेकिन इनका नियामक रिजर्व बैंक है। ऐसे में अगर किसी बैंक में कोई अनियमितता पाई जाती है, जनता के पैसे डूबने का खतरा खड़ा होता है तो उसके लिए रिजर्व बैंक जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। भारत में जिस तरह से बैंक घोटाले हो जाते हैं, उससे यह साफ है कि बैंकों पर निगरानी करने वाला तंत्र वाकई बेहद लापरवाह, कमजोर और अक्षम साबित हुआ है।

पीएमसी बैंक में लोगों के जिस तरह से पैसे फंस गए हैं, वह चिंताजनक है। इस बैंक के ग्राहकों में बड़ी संख्या तो उन लोगों की है, जिन्होंने जीवनभर की कमाई बैंक में सावधि जमा के रूप में भी जमा की थी। लोगों की पगार, पेंशन सब इसमें जमा होती है, उस इलाके के छोटे दुकानदारों और आवास समितियों के खाते इसमें हैं। पर अब सब बंद हैं। अस्पताल, बच्चों की फीस और रोजमर्रा के खर्च के पैसे पर बैंक ने ताला जड़ दिया है। छह महीने में मात्र दस हजार रुपए निकाल कर लोग कैसे अपना गुजारा कर पाएंगे, यह शायद रिजर्व बैंक ने नहीं सोचा। अब यह खुलासा हुआ है कि बैंक ने सारे नियम-कायदों को ताक पर रखते हुए लोगों का पैसा इस तरह लुटाया और बड़ी संख्या में फर्जी खाते खोल कर कंपनियों के विकास में योगदान किया और रिजर्व बैंक की आंखों में धूल झोंकी।

सहकारी बैंक हों या बड़े सरकारी और निजी बैंक, पिछले कुछ सालों में जिस तरह से इनमें घोटालों और गड़बड़ियों का खुलासा होता रहा है, उसने बैंकिंग व्यवस्था पर लोगों का भरोसा डिगाया है। हाल में एक निजी बैंक के कर्ज देने पर रोक लगा दी गई। इससे लोगों में यह डर बैठना स्वाभाविक है कि कहीं किसी दिन उनके बैंक में भी ऐसा न हो जाए। ऐसे मामलों में समस्या यह होती है कि जब किसी बैंक पर ग्राहकों के धन की निकासी जैसी कठोर पाबंदियां लगा दी जाती हैं तो पैसा लंबे समय तक के लिए अनिश्चितता में फंस जाता है। उस वक्त कोई यह नहीं बता सकता कि अंतिम समाधान कितने महीनों या सालों में होगा और लोगों की फंसी पूंजी कब निकलेगी।

रिजर्व बैंक को इस बारे में सोचना चाहिए कि अगर किसी बैंक पर इस तरह की कड़ी कार्रवाई करने की जरूरत है तो पहले यह सुनिश्चित हो कि लोगों के पैसे जब्त न हों। उन्हें रकम निकासी के तुरंत विकल्प दिए जाएं। बैंकों में होने वाली गड़बड़ियां बता रही हैं कि आॅडिट प्रणाली ठप-सी है। पंजाब नेशनल बैंक घोटाले में यही हुआ था और लंबे समय तक उस शाखा का ऑडिट ही नहीं हुआ जो नीरव मोदी और मेहुल चौकसी पर मेहरबान थी। सहकारी बैंकों को लूट से बचाने के लिए रिजर्व बैंक को अपना निगरानी तंत्र मजबूत करने की जरूरत है।

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