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संपादकीय: ताक पर कानून

पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने साफ लहजे में कहा था कि कोई भी व्यक्ति अपने आप में कानून नहीं बन सकता है और लोकतंत्र में भीड़तंत्र की इजाजत नहीं दी जा सकती है।

Author नई दिल्ली | September 24, 2019 1:30 AM
बिहार में फिर दिखा एक बार भीड़ का आतंक, युवक को जमकर पीटा, थूक चटवाया फोटो सोर्स-@lallkajal

पिछले कुछ समय से ऐसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं, जिनमें लोगों ने किसी व्यक्ति पर आरोप लगा कर कानून अपने हाथ में ले लिया और पीट-पीट कर उसकी जान ले ली। यह प्रवृत्ति चिंताजनक रूप से बढ़ी है और अब इसका दायरा बढ़ता जा रहा है। रविवार को आई खबरों के मुताबिक देश के अलग-अलग हिस्सों में सिर्फ शक के आधार पर तीन लोगों की बुरी तरह पिटाई गई जिससे उनकी मौत हो गई। दिल्ली में लोगों के घरों में खाना बना कर गुजारा करने और अपने बच्चों को पढ़ाने वाली एक विधवा महिला को चोरी का आरोप लगा कर एक परिवार ने इस कदर पीटा कि उसकी जान चली गई। इसी तरह, राजस्थान के झालावाड़ जिले में चोर बता कर एक दलित युवक को बेरहमी से पीट कर मार डाला गया। इसके अलावा, झारखंड में गोमांस बेचने के आरोप में तीन युवकों की बुरी तरह पिटाई की गई, जिसमें एक की मौत हो गई। कानून की फिक्र को ताक पर रख एक दिन में इस तरह की तीन घटनाएं आखिर क्या बताती हैं? क्या स्थिति यहां तक आ चुकी है कि भीड़ में शामिल होने या किसी बहाने जानलेवा तरीके से पिटाई करने वाले लोगों के दिमाग में कानून का खयाल नहीं आता?

पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने साफ लहजे में कहा था कि कोई भी व्यक्ति अपने आप में कानून नहीं बन सकता है और लोकतंत्र में भीड़तंत्र की इजाजत नहीं दी जा सकती है। अदालत ने भीड़ के हाथों हत्या को एक अलग अपराध की श्रेणी में रखने और इसकी रोकथाम के लिए नया कानून बनाने की बात कही थी। लेकिन उसके बाद मौजूदा कानूनों को भी धता बता कर ऐसी घटनाएं जिस तरह बदस्तूर जारी हैं, उससे साफ है कि ऐसे अपराधों पर लगाम लगाना शायद सरकारों की प्राथमिकता में नहीं है। कभी गोमांस के बहाने तो कभी बच्चा चोरी या फिर कोई सामान चुराने के आरोप में पकड़े गए किसी व्यक्ति को जब कोई समूह बर्बरता से पिटाई करने लगता है तो आखिर उसका विवेक क्यों ऐसा करने की इजाजत देता है? ऐसे लोगों को यह समझना जरूरी क्यों नहीं लगता कि अगर कोई काम कानून की परिभाषा में अपराध है तो उसके लिए सजा भी कानूनी प्रक्रिया के तहत ही तय होगी? ऐसे लोग आरोपी को पकड़ने के बाद उसे पुलिस के हाथों में क्यों नहीं सौंपते और उनकी जानलेवा पिटाई की हिम्मत उनके भीतर कहां से आती है?

हालांकि किसी अफवाह या आरोप की वजह से लोग जिस तरह एक भीड़ की शक्ल में तब्दील हो रहे हैं, उसकी स्वाभाविक परिणति यही है कि ऐसी स्थिति में किसी तथ्य पर विचार करना जरूरी नहीं समझा जाता है और दिमाग पर सिर्फ उत्तेजना और उन्माद हावी रहता है। इसके अलावा, जो लोग भीड़ बन कर हिंसा करते हैं, अक्सर उन पर सख्त कानूनी कार्रवाई नहीं होती, संदेह या भ्रम के आधार पर ज्यादातर लोग हत्या के अपराध से बच जाते हैं या फिर कई बार उन्हें राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होता है। ऐसे भी मामले सामने आए जब भीड़ के हाथों हत्या के अभियुक्तों को जमानत मिली तो किसी बड़े नेता ने उनका स्वागत भी किया। सवाल है कि क्या इससे बाकी जगहों पर अराजक तत्त्वों को शह नहीं मिलेगी? उन्माद की मानसिकता में जीने वाली भीड़ किसी के नियंत्रण में नहीं रहती है और उसका खमियाजा अमूमन निर्दोष लोगों को भुगतना पड़ता है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि अगर यह चलन इसी रफ्तार से आगे बढ़ी तो देश के लोकतांत्रिक ढांचे और विधि के शासन के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो जाएगी।

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