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संपादकीय: मिलावट का रोग

सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों की ओर से ऐसे अध्ययन अक्सर आते रहते हैं, जिनमें खाने-पीने की चीजों में मिलावट को लेकर चिंताजनक तथ्य दर्ज रहते हैं। लेकिन अब तक मिलावटखोरों के खिलाफ जैसे कानून हैं, उनके रहते इस कारोबार पर पूरी तरह रोक लगाना मुमकिन नहीं है।

सरकारें ऐसा धंधा करने वालों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर पाती हैं।

इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि खाने-पीने की जो चीजें हमारे जिंदा और स्वस्थ रहने के लिए सबसे जरूरी हैं, वे भी मिलावट के कारोबारियों के स्वार्थों और अकूत मुनाफे की कमाई की मंशा की शिकार हैं और सरकारें ऐसा धंधा करने वालों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर पाती हैं। यों मिलावटी सामान का भ्रष्ट और खतरनाक धंधा लंबे समय चल रहा है और इस पर चिंता जताने में हमारे सत्ता-संस्थानों ने कोई कमी नहीं की है। मगर सच यह है कि अब तक ऐसी कोई व्यवस्था लागू नहीं हो सकी है जिसमें ऐसा अपराध करने वालों को पूरी तरह रोका जा सके। ताजा खबर राजस्थान से है जहां का स्वास्थ्य विभाग दालों, घी, बेसन, मावा, पनीर जैसी अन्य खाने-पीने की चीजों में हो रही मिलावट के धंधेबाजों के खिलाफ अभियान चला रहा है। मगर गिरफ्त में आ सके लोगों पर भी कठोर कानूनी कार्रवाई नहीं हो पा रही है। वजह यह है कि ऐसे लोगों के खिलाफ सिर्फ जुर्माने के अलावा कोई सख्त कानूनी प्रावधान नहीं है। सवाल है कि इस कानूनी स्थिति के रहते मिलावट का कारोबार करने वालों को किस हद तक रोका जा सकेगा?

गौरतलब है कि राजस्थान में जमा किए गए खाद्य पदार्थों के करीब साढ़े इक्यावन हजार नमूनों में से साढ़े ग्यारह हजार से ज्यादा मिलावटी निकले। इनमें से भी करीब दो हजार नमूने मानव स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक पाए गए। हालांकि इसके अलावा भी खाने-पीने की जितनी चीजें हैं, उनमें कोई मिलावट सेहत को किसी न किसी रूप में नुकसान ही पहुंचाएगी। राजस्थान में यह किसी तरह सरकारी दस्तावेज में दर्ज हो सकने वाली कार्रवाई है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि इससे इतर समूचे बाजार में लोगों को किस तरह का सामान खरीदना और उसका ही सेवन करना पड़ता है। यह किसी से छिपा नहीं है कि ज्यादातर लोगों को मिलावटी सामान की पहचान करने के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं होती और बाजार में उन्हें जो भी मिलता है, उसे ही वे अच्छा मान कर खाते-पीते हैं। उन्हें यह पता भी नहीं चल पाता है कि किस खाद्य पदार्थ के सेवन का उनकी सेहत पर कैसा असर पड़ता है। जबकि सच यह है कि जिस तरह का सामान हम आज खा-पी रहे हैं, उसमें कई में ऐसे घातक तत्त्व भी होते हैं जो लंबे समय में हमारी सेहत को जोखिम में डालते हैं। किसी बीमारी के इलाज की स्थिति में शायद ही कभी जांच का सिरा यह होता है कि क्या मरीज ने किसी ऐसे खाद्य पदार्थ का इस्तेमाल किया है, जो उसके रोग के लिए जिम्मेदार है!

सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों की ओर से ऐसे अध्ययन अक्सर आते रहते हैं, जिनमें खाने-पीने की चीजों में मिलावट को लेकर चिंताजनक तथ्य दर्ज रहते हैं। लेकिन अब तक मिलावटखोरों के खिलाफ जैसे कानून हैं, उनके रहते इस कारोबार पर पूरी तरह रोक लगाना मुमकिन नहीं है। फिलहाल मिलावटखोरों के लिए जो आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है भी, उसमें यह साबित करने की जरूरत पड़ती है कि मिलावटी पदार्थ की वजह से ही किसी व्यक्ति की मौत हुई है। जाहिर है, यह साबित करना एक जटिल काम है और यही वजह है कि इस कारोबार में लगे लोग आराम से अपने मुनाफे का धंधा करते रहते हैं। कायदे से अगर किसी खाद्य पदार्थ के सेवन से व्यक्ति बीमार हो जाता है या उसकी जान चली जाती है तो उस सामान को खुदरा विक्रेता से लेकर उसकी आपूर्ति करने से जुड़े नीचे से ऊपर तक के सभी लोगों को जिम्मेदार मान कर उनके लिए हत्या या हत्या के प्रयास जैसे कानूनों में दर्ज सख्त सजा की तरह का प्रावधान होना चाहिए।

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