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संपादकीय: लापरवाही का हासिल

भारत की सरकार, जांच एजेंसियों, खुफिया एजेंसियों की हालत यह है कि जब सब कुछ हाथ से निकल जाता है तब ये सिर पटकना शुरू करते हैं। विजय माल्या का मामला देखें तो पता चल जाएगा कि सब कुछ सामने होने के बाद भी जांच एजेंसियां उसे भागने से रोक नहीं पाईं।

Author Published on: May 15, 2019 1:20 AM
मेहुल चोकसी ने एंटीगुआ की नागरिकता ले ली है।

पंजाब नेशनल बैंक घोटाले के आरोपी मेहुल चोकसी को भारत लाने के संबंध में अब तक सरकार जो दावे करती आ रही थी, उनकी कलई खुलने लगी है। हाल में खबर आई है कि एंटीगुआ की सरकार ने मेहुल चोकसी को भारत के हवाले करना तो दूर, उसे गिरफ्तार करने से भी इंकार कर दिया है। भारत ने इंटरपोल के जरिए चोकसी को पकड़ने की कार्रवाई शुरू की थी और इसी प्रक्रिया के तहत जांच एजेंसियों ने एंटीगुआ की सरकार पर दबाव बनाया था। लेकिन अब एंटीगुआ ने इंटरपोल को साफ कह दिया है कि वह अपने नागरिक को गिरफ्तार नहीं करेगा। भारत के लिए एंटीगुआ का यह कदम किसी झटके से कम नहीं है। एंटीगुआ का रुख बताता है कि भारत सरकार चाहे कुछ कर ले, चोकसी उसे नहीं मिलने वाला। हालांकि भारत का विदेश मंत्रालय और जांच एजेंसियां इस तथ्य से अनजान नहीं ही होंगी कि एंटीगुआ के क्या नियम-कानून हैं। फिर भी लंबे समय तक सरकार की ओर से देश की जनता को यह दिलासा दिया जाता रहा कि चोकसी को जल्द ही भारत लाया जाएगा।

मेहुल चोकसी और उसका भांजा नीरव मोदी पंजाब नेशनल बैंक से साढ़े तेरह हजार करोड़ का घोटाला कर भारत से भाग चुके हैं। नीरव मोदी इन दिनों ब्रिटेन की जेल में बंद है। उसे भी भारत लाने की कोशिश हो रही है और इस बारे में लंदन की एक अदालत सुनवाई कर रही है। सरकार चाहे कितने ही दावे करे, हकीकत यह है कि भगोड़े आर्थिक अपराधियों का प्रत्यर्पण आसान नहीं होता। चोकसी ने एंटीगुआ की नागरिकता दो साल पहले ही ले ली थी। लेकिन तब वह अदालत से भगोड़ा घोषित नहीं हुआ था और एंटीगुआ की नागरिकता लेने से संबंधित प्रक्रिया में भारत सरकार की ओर से मंजूरी मिलने में उसे कोई दिक्कत नहीं हुई थी। सवाल तो भारत के तंत्र पर उठते हैं। जब पीएनबी घोटाला सामने आने लगा था तभी चोकसी पर शिकंजा क्यों नहीं कसा गया? जिस तरह नीरव मोदी और मेहुल चोकसी भारत से भागे, उससे तो लगता है कि वे भागे नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित निकलने का मौका दिया गया।

भारत की सरकार, जांच एजेंसियों, खुफिया एजेंसियों की हालत यह है कि जब सब कुछ हाथ से निकल जाता है तब ये सिर पटकना शुरू करते हैं। विजय माल्या का मामला देखें तो पता चल जाएगा कि सब कुछ सामने होने के बाद भी जांच एजेंसियां उसे भागने से रोक नहीं पार्इं। हम यह सोच कर भले खुश हो लें कि विजय माल्या और नीरव मोदी ब्रिटेन के कानूनी शिकंजे में हैं, लेकिन हकीकत यह है कि वे वहां पूरी तरह सुरक्षित हैं और अपने बचाव के लिए कानूनी प्रक्रिया का फायदा उठा रहे हैं। इनकी भारत वापसी आसान नहीं है। भारत की सरकार भी यह जानती है। मेहुल चोकसी तो नीरव मोदी और विजया माल्या से कहीं ज्यादा सुरक्षित और मजबूत स्थिति में है। उसने भारत की नागरिकता छोड़ दी है और वह अब एंटीगुआ का स्थायी नागरिक है। उसकी सुरक्षा एंटीगुआ की जिम्मेदारी है। फिर भारत और एंटीगुआ के बीच प्रत्यर्पण संधि भी नहीं है। ऐसे में वह अपने नागरिक को कैसे भारत को सौंप सकता है! भारत को चाहिए कि वह पुख्ता तरीके से अपने तर्क और सबूत एंटीगुआ की अदालत में रखे और यह साबित करके दिखाए कि मेहुल चोकसी का प्रत्यर्पण भारत के लिए एंटीगुआ का नागरिक होने से कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। आर्थिक अपराध करने वाले भगोड़ों के प्रत्यर्पण को लेकर सरकार जितनी चिंता अब दिखा रही है, उतनी ही अगर पहले सजगता दिखाती तो शायद ये भाग नहीं पाते!

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