ताज़ा खबर
 

संपादकीय: फिर मध्यस्थता

रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने इस साल मार्च में न्यायमूर्ति एफएमआइ कलीफुल्ला की अध्यक्षता में तीन सदस्यों पैनल बनाया था।

Author Published on: September 19, 2019 3:41 AM
अदालत ने दोनों पक्षों के वकीलों से साफ कह दिया है कि इस मामले से जुड़ी दलीलें महीने भर के भीतर पूरी हो जानी चाहिए।

रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के बीच एक बार फिर से मध्यस्थता की बात उठी है। हालांकि इस बार सुनवाई करने वाले पांच सदस्यीय खंडपीठ ने यह साफ कर दिया है कि भले मध्यस्थता के प्रयास चलते रहें, लेकिन अदालत इस मामले की सुनवाई जारी रखेगी। अदालत ने दोनों पक्षों के वकीलों से साफ कह दिया है कि इस मामले से जुड़ी दलीलें महीने भर के भीतर पूरी हो जानी चाहिए। इससे एक बात साफ है कि अदालत इस मामले को अब और ज्यादा खींचने के पक्ष में बिल्कुल नहीं है। इसीलिए पिछले डेढ़ महीने से इस पर नियमित सुनवाई हो रही है, ताकि जल्द ही सवा सौ साल से ज्यादा पुराने इस मामले को तार्किक परिणति तक पहुंचाया जा सके। ऐसा जरूरी इसलिए भी है क्योंकि यह विवाद देश की राजनीति और समाज के लिए सालों से संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। इससे भी बड़ी बात यह है कि यह करोड़ों हिंदुओं की आस्था से जुड़ा प्रश्न है। इसलिए इसे अब और कानूनी दांवपेचों में उलझाने और मुकदमे को लटकाए रखने मंशा किसी भी तरह से उचित नहीं होगी।

हालांकि सर्वोच्च अदालत ने मध्यस्थता के लिए अपनी ओर से पर्याप्त प्रयास किए थे और समय भी दिया था। लेकिन मामला इतना ज्यादा जटिल और संवेदनशील है कि बातचीत के जरिए किसी सर्वमान्य समाधान पर पहुंचने के प्रयास सफल होते दिखे नहीं। इसके बाद ही सर्वोच्च अदालत के संविधान पीठ ने नियमित सुनवाई का फैसला किया। जाहिर है, विवाद के समाधान का इसके अलावा और कोई रास्ता रह भी नहीं गया था। यह तो शुरू से ही कहा जाता रहा है कि अगर बातचीत से कोई रास्ता निकलता है तो हिंदुओं और मुसलमानों के लिए इससे अच्छी कोई बात नहीं होगी। लेकिन व्यवहार में ऐसा कभी संभव होता नजर आया नहीं। फिर भी अगर एक और मध्यस्थता प्रयास की बात उठी है तो यह भी लगता है कि कहीं न कहीं कोई गुंजाईश अभी भी है। अगर इस विवाद से जुड़े पक्षकार फिर से मध्यस्थता प्रक्रिया शुरू करना चाहते हैं तो इसमें कोई बुराई नहीं है और संविधान पीठ ने भी इसका स्वागत किया है।

रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने इस साल मार्च में न्यायमूर्ति एफएमआइ कलीफुल्ला की अध्यक्षता में तीन सदस्यों पैनल बनाया था। लेकिन जुलाई में मामले के पक्षकारों ने जिस तरह के तर्क और दलीलें संविधान पीठ के सामने रखे, वे एक तरह से मध्यस्थता पैनल के प्रयासों पर सवाल उठाने जैसे थे। एक पक्षकार के वकील ने अदालत से कहा कि याचिकाकर्ता के पिता ने जनवरी 1950 में यह मामला दायर किया था और अब याचिकाकर्ता खुद अस्सी साल के हो चुके हैं। ऐसे में इस मामले को जल्द सुलझाया जाना चाहिए और इसका समाधान मध्यस्थता से संभव नहीं लग रहा। एक और पक्षकार रामलला विराजमान के वकील ने भी जल्द सुनवाई का अनुरोध किया।

निर्मोही अखाड़े के वकील ने यह कह दिया कि पक्षकारों के बीच सीधी बातचीत होनी चाहिए, लेकिन इस मामले में पक्षकारों के बीच सीधे ऐसी कोई बातचीत नहीं हुई, जिससे मामले का हल निकलता नजर आए। दूसरी ओर, मुसलिम पक्ष के वकील ने इन सबका विरोध किया और अदालत से अनुरोध किया इस तरह के तर्कों, दलीलों और सुझावों पर विचार नहीं किया जाए। पक्षकारों के इस तरह के रवैए से ही तब लगा था कि मध्यस्थता से बात नहीं बनने वाली। इसलिए अब यह कह पाना मुश्किल है कि जो पक्षकार फिर से मध्यस्थता चाह रहे हैं वे इस मामले को लेकर गंभीर हैं भी कि नहीं! अगर वाकई बातचीत से इस मामले को सुलझाने की इच्छा है तो बिना किसी हठधर्मिता के तार्किक और लचीला रवैया अपनाना होगा।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 जनसत्ता विशेष: …ताकि याद आएं पुरखे
2 जनसत्ता विशेष: साधु के कैमरे में खूबसूरत हिमालय
3 जनसत्ता विशेष: वैश्विक बन गया है प्रधानमंत्री का चेहरा