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संपादकीय: दोहरा रुख

करीब डेढ़ साल पहले चीन के शियामेन ब्रिक्स सम्मेलन के घोषणा-पत्र में आतंकवाद के सभी रूपों की निंदा की गई थी। उसमें पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठनों मसलन लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हक्कानी नेटवर्क का भी जिक्र किया गया था।

Author March 15, 2019 3:10 AM
मसूद अजहर। फोटो सोर्स : इंडियन एक्सप्रेस

आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादियों की सूची में शामिल कराने के प्रयासों पर चीन ने जिस तरह अपनी वीटो-शक्ति का इस्तेमाल किया, वह उसका नया रुख नहीं है। हालांकि इस बात की आशंका पहले से थी कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस की ओर से पेश इस प्रस्ताव को पारित कराने के मामले में चीन सहयोग नहीं करेगा। इसके बावजूद हाल में जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में हुए आतंकी हमले के दौरान सीआरपीएफ के बयालीस जवानों की जान जाने और जैश-ए-मोहम्मद की ओर से इस घटना की जिम्मेदारी लेने के बाद यह उम्मीद थी कि चीन वास्तविकता को ध्यान में रख कर इस बार अपने पुराने रुख से अलग फैसला लेगा। लेकिन इस प्रस्ताव के सामने आने पर चीन ने साफतौर पर कह दिया कि वह मसूद अजहर पर प्रतिबंध लगाने की अपील को समझने के लिए और समय चाहता है। सवाल है कि जैश-ए-मोहम्मद, मसूद अजहर या उसकी गतिविधियों के संबंध में अब क्या छिपा हुआ है कि उसे समझने के लिए चीन को अलग से कोशिश करनी पड़ेगी!

गौरतलब है कि यह चौथा मौका था जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करने लिए प्रस्ताव आया तो चीन ने अपनी वीटो शक्ति का इस्तेमाल कर उसे पारित नहीं होने दिया। अजहर मसूद के संगठन जैश-ए-मोहम्मद को करीब अठारह साल पहले ही आतंकी घोषित किया जा चुका है। यह समझना मुश्किल है कि चीन की नजर में आतंकवादी होने की परिभाषा क्या है और आखिर किन वजहों से वह वैश्विक मत को दरकिनार करके मसूद अजहर को लेकर इतना नरम रुख बनाए हुए है। क्या इसे आतंकवाद के मसले पर चीन के दोहरे रवैये के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए? कुछ समय पहले चीन के विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा था कि हम भारत के साथ आतंकवाद विरोधी और सुरक्षा सहयोग के मोर्चे को मजबूत करना चाहेंगे और दोनों देश मिल कर क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा के लिए काम करेंगे। सवाल है कि जिस व्यक्ति को तकनीकी रूप से अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित कराने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्य अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देश भी पहल कर रहे हैं, उसका बचाव करके चीन भारत के साथ आतंकवाद विरोध के किस मोर्चे को मजबूत करने की बात करना चाहता है?

गौरतलब है कि करीब डेढ़ साल पहले चीन के शियामेन ब्रिक्स सम्मेलन के घोषणा-पत्र में आतंकवाद के सभी रूपों की निंदा की गई थी। उसमें पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठनों मसलन लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हक्कानी नेटवर्क का भी जिक्र किया गया था। तब निश्चित तौर पर ब्रिक्स सम्मेलन में पाकिस्तान स्थित ठिकानों से अपनी गतिविधियां चलाने वाले आतंकी संगठनों के खिलाफ निंदा को घोषणा-पत्र में शामिल कराने को भारत की कूटनीतिक कामयाबी के तौर पर देखा गया था। लेकिन यह भी सच है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मसूद अजहर के मसले पर कूटनीतिक प्रयासों को वांछित सफलता नहीं मिल सकी। लेकिन क्या यह विचित्र नहीं है कि जैश-ए-मोहम्मद नामक जिस संगठन को आतंकवादी बता कर निंदा करने के प्रस्ताव पर चीन ने सहमति जताई थी, उसके मुखिया को आतंकवादी घोषित कराने और प्रतिबंध लगाने की कोशिश को वह बाधित करता है? अगर चीन भारत के साथ सहयोग संबंध को मजबूत करने का दावा करता है, तो उसे आतंकवाद के मसले पर भारत की पीड़ा को भी समझने की कोशिश करनी होगी।

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