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संपादकीय: लॉटरी की दर

वस्तुओं पर कर का निर्धारण करते समय ध्यान रखा जाता है कि उसके उपभोक्ता किस आय वर्ग के हैं, उस वस्तु की खपत और समाज में उसकी उपादेयता कितनी है। अगर उस वस्तु से समाज के कमजोर आर्थिक तबके पर बोझ बढ़ता है, तो उसे अच्छा नहीं माना जाता।

बैठक के बाद मीडिया को संबोंधित करती वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण। फोटो: ANI

वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी को लागू हुए करीब ढाई साल हो गए। इस बीच कई बार व्यापारियों और उपभोक्ताओं की समस्याओं के मद्देनजर करों में बदलाव के लिए जीएसटी परिषद की बैठकें हो चुकी हैं। हर बार सर्वसम्मति से फैसले किए गए। पर यह पहली बार है, जब किसी कर के निर्धारण को लेकर परिषद के सदस्यों के बीच मतदान का सहारा लेना पड़ा। यह मौका था लॉटरी पर एक समान कर निर्धारण का। लॉटरी की बिक्री पर संबंधित राज्य में बारह प्रतिशत जीएसटी का प्रावधान था, जबकि दूसरे राज्यों में उन्हें बेचने पर जीएसटी अठाईस फीसद रखा गया था। कुछ लोगों की मांग थी कि इस पर दो तरह के कर न रखे जाएं। मगर जीएसटी परिषद के कुछ सदस्य इसके पक्ष में नहीं थे। आखिर मतविभाजन का सहारा लेना पड़ा। इसमें इक्कीस राज्यों ने लॉटरी पर जीएसटी की दर अठाईस फीसद करने के पक्ष में मतदान किया। इस तरह अब सभी जगह लॉटरी की बिक्री पर एक समान दर अठाईस फीसद कर दी गई है।

वस्तुओं पर कर का निर्धारण करते समय ध्यान रखा जाता है कि उसके उपभोक्ता किस आय वर्ग के हैं, उस वस्तु की खपत और समाज में उसकी उपादेयता कितनी है। अगर उस वस्तु से समाज के कमजोर आर्थिक तबके पर बोझ बढ़ता है, तो उसे अच्छा नहीं माना जाता। इसीलिए शुरू में जब जीएसटी दरों का निर्धारण किया गया, तो बहुत सारी वस्तुओं पर कराधान अधिक होने से आम उपभोक्ता पर आर्थिक बोझ पड़ने वाला था। उसका विरोध हुआ तो सरकार ने उनके करों में बदलाव किया। लॉटरी एक तरह का जुआ है। इससे नागरिकों के जीवन पर कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ता। बल्कि बहुत सारे लोगों में लॉटरी खेलने का नशा इस कदर हावी देखा जाता है कि वे परिवार के भरण-पोषण की परवाह किए बगैर अपनी कमाई लॉटरी पर लुटा बैठते हैं। कई लोग लॉटरी के चक्कर में भारी कर्ज में फंस जाते हैं। उन्हें सिर्फ यह उम्मीद होती है कि कभी न कभी किस्मत खुलेगी और वे भारी रकम जीत लेंगे, जिससे उनका जीवन खुशहाल हो जाएगा। यह उम्मीद जब नशे का रूप ले लेती है, तो कई लोगों के घर-परिवार भी बर्बाद करती देखी गई है। फिर लोगों में लॉटरी के नशे को देखते हुए बहुत सारे फर्जी लॉटरी बनाने वाले इस खेल में शामिल हो जाते हैं। इस तरह लॉटरी का बहुत सारा पैसा न तो लॉटरी कंपनियों को जा पाता है और न सरकार को उस पर राजस्व मिल पाता है। लॉटरी के इन्हीं दुष्प्रभावों को देखते हुए अधिकतर राज्यों में लॉटरी का कारोबार बंद कर दिया गया। मगर कुछ राज्यों में अब भी यह चलता है। वहां की लॉटरी दूसरे राज्यों में भी बेची जाती है।

जिन राज्यों में लॉटरी के कारोबार की अनुमति है, उन्हें इससे राजस्व की खासी कमाई होती है। कुछ राज्य सरकारें खुद लॉटरी चलाती हैं। सो, समझना मुश्किल नहीं कि उन्हें अंदेशा रहा होगा कि इस पर कर की दर ऊंची रखने से बहुत सारे खरीदारों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा, इसलिए स्वाभाविक ही वे इसका विरोध कर रही थीं। मगर लॉटरी न तो आवश्यक वस्तुओं की सूची में आती है और न सेवा क्षेत्र में, इसलिए इस पर बारह प्रतिशत कर की दर रखने का कोई औचित्य नहीं था। अगर कर की दर ऊंची होने से कुछ गरीब लोग इसकी लत से मुक्त हो सकें, तो अच्छा ही है।

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