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संपादकीय: मिशन और उम्मीद

अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारतीय वैज्ञानिकों ने अपनी प्रतिभा के झंडे गाड़े हैं। इसरो आज नासा या दूसरी अंतरिक्ष एजेंसियों के मुकाबले भले पीछे हो, लेकिन उसकी उपलब्धियां इनकी तुलना में कहीं कम नहीं हैं।

Author Published on: September 9, 2019 1:09 AM
ISRO ने विक्रम लैंडर खोज निकाला है और उससे संपर्क करने की कोशिश की जा रही है।

चंद्रयान-2 के साथ गया लैंडर ‘विक्रम’ भले चांद की सतह पर नहीं उतर पाया हो, लेकिन इसे अभियान की असफलता मानना उचित इसलिए नहीं होगा क्योंकि मिशन का बड़ा लक्ष्य हासि कर लिया गया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के वैज्ञानिकों ने जिस लगन और कड़ी मेहनत से पूरे चंद्रयान-2 अभियान को इस मुकाम तक पहुंचाया है, वह कम बड़ी उपलब्धि नहीं है। इस मिशन की योजना से लेकर आर्बिटर, लैंडर और रोवर के निर्माण, इनके जटिल परीक्षण, छोड़ने की योजना जैसे कई चरण रहे हैं, जिनसे हमारे वैज्ञानिकों ने काफी कुछ सीखा भी और दुनिया को इस बात का लोहा भी मनवाया कि कम से कम खर्च में पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक से भारत ऐसे बड़े अंतरिक्ष अभियानों का सफल संचालन कर सकता है। अभी समस्या यही आई कि चंद्रमा की सतह से मात्र इक्कीस सौ मीटर दूर रह गए लैंडर का इसरो के नियंत्रण कक्ष से संपर्क टूट गया और आंकड़े मिलने बंद हो गए। हालांकि अभी वैज्ञानिक जुटे हैं कि लैंडर से संपर्क स्थापित हो जाए। अंतरिक्ष अभियानों में यान या उपग्रहों के कई बार नियंत्रण कक्ष से संपर्क टूटते रहने की घटनाएं असमान्य नहीं हैं। इसी उम्मीद में इसरो प्रमुख ने यह कहा है कि दो हफ्ते तक लैंडर से संपर्क की कोशिश जारी रहेगी।

ऐसा नहीं है कि वैज्ञानिकों को इस बात का अंदेशा नहीं था कि लैंडर को चंद्रमा की सतह पर उतारने में मुश्किलें नहीं आएंगी। इसरो प्रमुख तो कहते ही आए हैं कि आखिर के पंद्रह मिनट इस पूरे अभियान के सबसे जोखिम भरे हो सकते हैं। वैज्ञानिक इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि लाखों किलोमीटर दूर एक दुर्गम स्थान पर यान को उतारना कितना जटिल काम होता है। लाखों-करोड़ों किलोमीटर दूर जाने वाले जितने भी अंतरिक्ष अभियान होते हैं वे सेकंड के लाखवें हिस्से की गणना पर आधारित होते हैं। भारत के लिए यह अभियान चुनौती भरा इसलिए भी है, क्योंकि चांद पर जिस जगह लैंडर को उतारा जाना है उसे सबसे ज्यादा जोखिमवाला माना जाता है। यह चांद का दक्षिणी ध्रुव है, जहां आज तक भारत के अलावा किसी देश ने अपना मिशन नहीं भेजा है। भारत दुनिया का पहला देश है, जिसने धरती के इस उपग्रह पर और वह भी सबसे मुश्किल जगह पर लैंडर उतारने का प्रयास किया।

अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारतीय वैज्ञानिकों ने अपनी प्रतिभा के झंडे गाड़े हैं। इसरो आज नासा या दूसरी अंतरिक्ष एजेंसियों के मुकाबले भले पीछे हो, लेकिन उसकी उपलब्धियां इनकी तुलना में कहीं कम नहीं हैं। खास बात यह है कि अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत ने अब तक जो कुछ हासिल किया है वह अपने बलबूते किया है। अगर रूस जैसे देशों से मदद ली भी है तो बहुत जरूरी होने पर। भारत ने चंद्रयान-1 और मंगल मिशन जैसे कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है। इसके अलावा व्यावसायिक स्तर पर बात करें तो दूसरे देशों के उपग्रह प्रक्षेपित करने और वह भी सौ से ज्यादा उपग्रह एक साथ छोड़ने जैसा करिश्मा भारतीय वैज्ञानिकों ने कर दिखाया है। ऐसे क्षण कई बार आते हैं जब हमें कुछ असफलताओं का सामना करना पड़ता है, लेकिन ये असफलताएं हमें कुछ सिखाती भी हैं। भारत को अपने वैज्ञानिकों की प्रतिभा पर नाज है, उनके काम पर विश्वास है। वैज्ञानिक समुदाय देशवासियों की इस भावना को समझता है। लैंडर का नियंत्रण कक्ष से संपर्क टूटा है, पर हमारी उम्मीदें नहीं।

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