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संपादकीय: जमीन का जीवन

करीब दो साल पहले आए एक अध्ययन के मुताबिक भारत की लगभग तीस फीसद जमीन खराब या बंजर होने की कगार पर है।

Author Published on: September 10, 2019 4:50 AM
संकेरतीक तस्वीर।

पिछले कुछ दशकों के दौरान हमारे देश में खेती के लगातार घाटे का सौदा होने की समस्या पहले ही गंभीर होती गई है। इससे इतर एक बड़ी मुश्किल यह खड़ी हो गई है कि तेजी से शहरीकरण और ग्रामीण इलाकों में भी रिहाइशी इलाकों के विस्तार की वजह से जिस तरह खेती-योग्य जमीन का रकबा सिकुड़ रहा है, उसमें यह चिंता स्वाभाविक है कि आने वाले वक्त में अनाज उत्पादन की स्थिति क्या होगी! हालांकि देश में खेती के लायक जमीन की कमी नहीं है, लेकिन सच यह है कि इसमें एक बड़ा भूभाग बंजर है और उसकी कोई उपयोगिता नहीं है, बल्कि जमीन के बंजर होने का एक गंभीर असर पानी की उपलब्धता और उसके संरक्षण की कोशिशों पर भी पड़ता है।

आमतौर पर आर्थिक गतिविधियों की चर्चा और उनके आंकड़ों से विकास की रफ्तार का अंदाजा परोसने के क्रम में भूमि के बंजर होने और उससे पैदा होने वाली समस्याओं का आकलन पीछे छूट जाता है। जबकि अनाज उत्पादन से लेकर पानी और पेड़-पौधों तक का संरक्षण आर्थिक चक्र के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। ऐसे में प्रधानमंत्री ने बंजर जमीन की समस्याओं को लेकर चिंता जाहिर की है।

गौरतलब है कि सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र के ताजा सम्मेलन (यूएनसीसीडी) की एक सभा में कहा कि 2015 और 2017 के दौरान भारत में पेड़ और जंगल के दायरे में करीब आठ लाख हेक्टेयर की बढ़ोतरी हुई है और इससे बंजर जमीन को उपजाऊ बनाने में बड़ी मदद मिलेगी। इसके अलावा, उन्होंने यह घोषणा भी की कि अब से लेकर सन 2030 तक भारत अपनी जमीन को उपजाऊ बनाने के मकसद से खेती के कुल रकबे का भी विस्तार करेगा और उसे 2.1 करोड़ हेक्टेयर से बढ़ा कर 2.6 करोड़ हेक्टेयर करेगा।

जाहिर है, यह न केवल देश में भूमि की उपयोगिता के मद्देनजर बेहद अहम घोषणा है, बल्कि इससे जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता और भूमि क्षरण जैसे मामलों में भी चुनौतियों का सामना करने के लिए एक ठोस भूमिका बनेगी। एक अहम चिंता यह भी है कि पिछले कुछ दशकों में प्लास्टिक के बेतहाशा उपयोग ने सही-सलामत जमीन को भी लगभग बंजर बना दिया है। इसी के मद्देनजर सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने इस पर भी चिंता जताई कि अगर प्लास्टिक के बढ़ते इस्तेमाल को नहीं रोका गया तो भूक्षरण का एक अन्य स्वरूप सामने आएगा और नतीजे में जमीन की उत्पादकता को फिर से हासिल करना संभव नहीं रह पाएगा।
करीब दो साल पहले आए एक अध्ययन के मुताबिक भारत की लगभग तीस फीसद जमीन खराब या बंजर होने की कगार पर है। यानी इस दिशा में जताई जाने वाली चिंता से आगे अगर ठोस पहल नहीं की जाती है तो आने वाले वक्त में समूचे देश को एक बड़े संकट से दो-चार होना पड़ सकता है। तकनीक के विकास और विस्तार से बंजर जमीन को खेती योग्य या पेड़-पौधे लगाने के लायक बनाया जा सकता है।

मगर दूसरी ओर विकास का हवाला देकर अगर वन क्षेत्र की संरक्षित भूमि की अहमियत को नजरअंदाज किया जाता है और खनन या दूसरी वजहों से पेड़ों को काटने को मंजूरी दी जाती है तो उसके असर का आकलन भी कर लिया जाना चाहिए। यों भी, जब बंजर भूमि को उपजाऊ बनाने की दिशा में कारगर पहलकदमी होती है तो वह जल संकट को दूर करने में भी मददगार साबित होगी। यह किसी से छिपा नहीं है कि हाल के वर्षों में भारत सहित दुनिया के कई देश जिस तरह पानी की कमी की चपेट में आए हैं, वह भविष्य को लेकर एक गंभीर चेतावनी है।

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