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संपादकीय: कुदरत का कहर

जब भी कोई हादसा होता है तो स्वाभाविक ही सुरक्षा इंतजामों की तरफ अंगुली उठने लगती है। मगर जिन मामलों में खुद सतर्कता बरत कर सुरक्षित रहा जा सकता है, उसमें असावधानी विवेक की निशानी नहीं कही जा सकती।

Author Published on: January 16, 2020 1:42 AM
हिंमस्खलन का खतरा हमेशा मंडराता रहता है।

पहाड़ों का जीवन यों तो हर समय कठिन होता है, पर सर्दी में कुछ अधिक समस्याओं से घिर जाता है। जब पहाड़ों पर बर्फ गिरती है, तो कई खतरे बढ़ जाते हैं, जिंदगी की रफ्तार धीमी हो जाती है। मैदानी हिस्सों में रहने वालों के लिए बर्फबारी के नजारे कुतूहल और रोमांच से भरे होते हैं, पर जिन्हें उसी बर्फ में अपनी रोजमर्रा की चीजें जुटानी और अपनी जिम्मेदारियां निभानी होती हैं, उनके सामने जोखिम भी कम नहीं होते। कभी बर्फीली आंधी उन्हें अपने आंचल में लपेट लेती है, तो कभी ऊंची चोटियों से टूट कर गिरे हिमखंड उनकी जान के दुश्मन बन जाते हैं। हर साल सर्दी में बर्फीली आंधी और हिमस्खलन की वजह से अनेक लोगों को अपनी जान तक गंवानी पड़ती है। इस बार भी अब तक कश्मीर के अलग-अलग हिस्सों से छह सैनिकों समेत बारह लोगों के हिमस्खलन में दब कर मारे जाने की खबर है। एक सैन्य शिविर पर बर्फ का पहाड़ आ टूटा और कई जवान मारे गए। सैनिकों पर ऐसे खतरे हर समय मंडराते रहते हैं। वे सिर्फ दुश्मन की गलत नीयत का शिकार नहीं होते, कुदरत भी उन्हें कम चुनौती नहीं देती। इसी तरह कई सैलानी लापरवाही से, तो स्थानीय लोग किसी चूक की वजह से बर्फ में दफन हो जाते हैं।

आमतौर पर हिमस्खलन वहां ज्यादा खतरनाक होता है, जहां ऊंची पर्वत चोटी और नीचे गहरी खाई होती है। उधर से कोई सड़क गुजर रही हो या फिर कोई सुरक्षा चौकी बनाई गई हो, तो उधर से गुजरने वालों पर हिंमस्खलन का खतरा हमेशा मंडराता रहता है। बरसात में पहाड़ों के टूट कर गिरने से भी ऐसे हादसों की आशंका बनी रहती है। यों सरकार की तरफ से हर तरह के जोखिम से पार पाने के एहतियाती उपाय किए जाते हैं, फिर भी कहीं चूक रह जाने से बड़े हादसे हो ही जाते हैं। अक्सर इस मौसम में मैदानी भागों से बड़ी संख्या में सैलानी बर्फबारी देखने पहाड़ों का रुख करते हैं। रोमांच के लिए वे अक्सर जोखिम उठाते देखे जाते हैं। सुरक्षा कर्मियों की मनाही के बावजूद या फिर उन्हें चकमा देकर खतरनाक ढलानों वाली जगहों पर तस्वीरें खिंचाने के लिए पहुंच जाते हैं। उसी समय मौसम अचानक बदलने या पहाड़ की चोटी से बर्फ खिसकने से वे उसकी चपेट में आ जाते हैं। कश्मीर में हुए हादसों में कई सैलानी इसी मनमानी और असावधानी के चलते मारे गए।

जब भी कोई हादसा होता है तो स्वाभाविक ही सुरक्षा इंतजामों की तरफ अंगुली उठने लगती है। मगर जिन मामलों में खुद सतर्कता बरत कर सुरक्षित रहा जा सकता है, उसमें असावधानी विवेक की निशानी नहीं कही जा सकती। हां, कश्मीर के पहाड़ों पर दुश्मन देश की हरकतों पर नजर रखने, आतंकी घुसपैठियों को रोकने के लिए सुरक्षा चौकियां बनाना जरूरी है। मगर हर साल कई सैनिक सिर्फ इसलिए मारे जाते हैं कि वे खतरनाक रास्तों पर गश्ते देत या फिर जोखिम वाली जगहों पर बने शिविरों में तैनात रहते हैं और हिमस्खलन या पहाड़ खिसकने से उनके नीचे दब जाते हैं। सैनिकों को इस जोखिम से बाहर निकालने की जिम्मेदारी आखिर सरकार की ही है। आज जब सुरक्षा संबंधी तकनीक इतनी उन्नत हो चुकी है, मौसम और कुदरत की हलचलों पर नजर रखने के अत्याधुनिक उपकरण बन चुके हैं, फिर भी हमारे सैनिकों को ऐसे जोखिमों के बीच अपना कर्तव्य निभाना पड़ता है, तो इस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है।

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