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संपादकीय: खतरे के संकेत

स्थानीय लोग अपनी कुछ मांगों के साथ इस कंपनी के सामने प्रदर्शन कर रहे थे, तो वहां ओआइएसएफ यानी ओड़ीशा औद्योगिक सुरक्षा बल के साथ उनका टकराव हुआ और हिंसा भड़क गई।

Author March 20, 2019 3:24 AM
वेदांता एल्यूमिनियम कारखाना (फोटो सोर्स : Reuters)

ओड़ीशा में कालाहांडी के लांजीगढ़ में स्थित वेदांता एल्यूमिनियम कारखाने के पास स्थानीय लोगों के विरोध के दौरान भड़की हिंसा में दो लोगों की मौत और बीस से ज्यादा लोगों के घायल होने को देश के अलग-अलग हिस्सों में होने वाली आम घटना के तौर पर देखा जा सकता है। लेकिन अपनी प्रकृति में यह घटना थोड़ी अलग है और शुरुआती खबरों के मुताबिक जो वजहें सामने आई हैं, वे चिंता पैदा करने वाली हैं। सोमवार को स्थानीय लोग अपनी कुछ मांगों के साथ इस कंपनी के सामने प्रदर्शन कर रहे थे, तो वहां ओआइएसएफ यानी ओड़ीशा औद्योगिक सुरक्षा बल के साथ उनका टकराव हुआ और हिंसा भड़क गई। इसमें विरोध प्रदर्शन में शामिल एक व्यक्ति की जान चली गई और कमरे में लगाई गई आग में ओआइएसएफ का एक सुरक्षाकर्मी जिंदा जल गया। अब भले ही कंपनी की ओर से यह कहा गया हो कि सुरक्षाकर्मियों ने बचाव में कदम उठाया, लेकिन सवाल यह है कि आखिर लोगों के विरोध का इतना उग्र कैसे हो गया कि टकराव हिंसक और जानलेवा हो गया। स्थानीय आबादी के विरोध के मद्देनजर क्या कोई और रास्ता नहीं था कि मामले से बिना हिंसा के निपटा जाता!

इसके साथ ही इस पहलू की भी जांच होनी चाहिए कि क्या इस हिंसा के पीछे उकसाने वाले तत्त्व भी थे! ताजा विरोध और हिंसा की जड़ में मुख्य वजह यह सामने आई है कि लांजीगढ़ के वेदांता एल्यूमिनियम रिफाइनरी में स्थानीय लोग भी नौकरी की मांग कर रहे थे। साथ ही उन्होंने कंपनी की ओर से चलाए जा रहे अंग्रेजी माध्यम स्कूल में अपने बच्चों के दाखिले की मांग की थी। विरोध प्रदर्शन में यही मुद्दा मुख्य था, जिसका समाधान बातचीत के जरिए निकाला जा सकता था। यह समझना मुश्किल है कि आखिर किस बात का इंतजार किया गया। विरोध प्रदर्शन को देखते हुए अगर सुरक्षा व्यवस्था के मोर्चे पर पर्याप्त इंतजाम किया गया होता, प्रशासनिक अमला अपनी जिम्मेदारी ठीक से निभाता तो शायद इस स्तर की हिंसा की नौबत नहीं आती। गौरतलब है कि करीब साल भर पहले तमिलनाडु के तुतीकोरिन में वेदांता के ही कॉपर प्लांट के बाहर प्रदर्शन कर रहे लोगों पर गोलियां बरसा दी गई थीं, जिसमें तेरह लोगों की मौत हो गई थी। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि ऐसे विरोध प्रदर्शन कोई तात्कालिक आवेश का नतीजा नहीं होते। कालाहांडी के स्थानीय लोग अगर कंपनी में नौकरी और अच्छे स्कूल में बच्चों का दाखिला चाह रहे थे, तो यह कोई एक दिन में उपजी मांग नहीं होगी।

कालाहांडी का समूचा इलाका अब भी ओड़ीशा के सबसे अभावग्रस्त इलाके के रूप में जाना जाता है। प्रचुर खनिज संपदा से भरे हुए इलाकों में सरकार के सहारे कई बड़ी सुविधाएं प्राप्त कर निजी कंपनियां अपना कारोबार तो शुरू कर लेती हैं, लेकिन स्थानीयता के तकाजे से लेकर वहां के लोगों की जरूरतों का ध्यान रखना उनकी प्राथमिकता में शामिल नहीं होता। खासतौर पर जंगल क्षेत्र में रहने वाले आदिवासी एक ओर जमीन कंपनियों के हाथों जाते देखते रहते हैं, दूसरी ओर जंगल पर निर्भर उनकी रोजी-रोटी पर भी आफत आती है। निश्चित रूप से यह चिंता की बात है। कालाहांडी में लांजीगढ़ के लोग अगर नौकरी और स्कूल में बच्चों के दाखिले की मांग कर रहे थे तो इसका मतलब यही है कि कंपनी से लेकर सरकार तक की ओर से वहां रोजगार और शिक्षा के क्षेत्र की घोर अनदेखी की गई है। एक ही इलाके में एक ओर ज्यादातर लोग अगर अभाव में जी रहे हों और दूसरी ओर कुछ लोग मुनाफे का कारोबार कर रहे हों या स्तरीय सुविधाएं हासिल कर रहे हों तो इस पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

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