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संपादकीय: ताज और चुनौतियां

नड्डा ने उपेक्षित से समझे जाने वाले हिमाचल प्रदेश में पार्टी की जड़ें मजबूत करते हुए इसे भाजपा का गढ़ बना डाला।

प्रधानमंत्री और गृह मंत्री (पूर्व भाजपा अध्यक्ष) ने उम्मीद भी यही जताई है कि नए अध्यक्ष पार्टी को और ज्यादा मजबूत व व्यापक बनाएंगे। (फोटो-इंडियन एक्सप्रेस)

पिछले साल जुलाई में जगत प्रकाश नड्डा को जब भाजपा का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया था, तभी यह साफ हो गया था कि वे ही भाजपा के अगले अध्यक्ष होंगे। सोमवार को औपचारिक रूप से भाजपा अध्यक्ष के लिए चुनाव की प्रक्रिया पूरी हुई और नड्डा के सामने कोई उम्मीदवार नहीं होने के बाद उन्हें पार्टी का अगला अध्यक्ष घोषित कर दिया गया। पर अब अध्यक्ष बनते ही नड्डा की जिम्मेदारियां और चुनौतियां पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा बढ़ गई हैं। अभी तक तो भाजपा संगठन में सारे फैसले अमित शाह ही लेते रहे थे, बिना उनके पार्टी में पत्ता तक नहीं हिलता था। अब यह काम नड्डा को करना होगा। ऐसे में जो कुछ अमित शाह छोड़ कर जा रहे हैं, उसे बनाए रखते हुए नड्डा को पार्टी को और तेजी से आगे ले जाना है। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री (पूर्व भाजपा अध्यक्ष) ने उम्मीद भी यही जताई है कि नए अध्यक्ष पार्टी को और ज्यादा मजबूत व व्यापक बनाएंगे। इसलिए नड्डा के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे पार्टी संगठन से ज्यादा प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की उम्मीदों को पूरा करें।

नड्डा भाजपा के पुराने मंजे हुए नेता हैं। छात्र संघ से लेकर संगठन तक की राजनीति उन्होंने की है। हिमाचल प्रदेश जैसे राज्य की राजनीति का उन्हें गहरा तजुर्बा है। नड्डा ने उपेक्षित से समझे जाने वाले हिमाचल प्रदेश में पार्टी की जड़ें मजबूत करते हुए इसे भाजपा का गढ़ बना डाला। इसलिए भाजपा को आगे बढ़ाने का अमित शाह जैसा कौशल नड्डा में भी है, इसमें कोई संशय नहीं है। हालांकि नए अध्यक्ष के लिए यह चुनौती भरा काम होगा। नड्डा का कार्यकाल तीन साल का है और इन तीन सालों में ही उन्हें काफी कुछ करके दिखाना होगा। ऐसा इसलिए भी है कि हर कोई नड्डा की सफलताओं-विफलताओं की तुलना पूर्व अध्यक्ष से करेगा। अमित शाह के पार्टी अध्यक्ष रहते हुए देश के कई राज्यों में भाजपा का न सिर्फ आधार बढ़ा है, बल्कि कई राज्यों में भाजपा सत्ता में आई। खासतौर से 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा की जोरदार जीत और 2017 में विधानसभा चुनावों के बाद प्रदेश में भाजपा की सरकार बनना अमित शाह की बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। इसी तरह असम सहित पूर्वोत्तर के राज्यों में भी भाजपा की जीत का जो परचम फहरा, उसका श्रेय शाह को ही जाता है। अब जीत का यही सिलसिला नड्डा को आगे बढ़ाना है।

नड्डा ने पार्टी की कमान ऐसे वक्त में संभाली है जब कुछ दिन बाद ही दिल्ली विधानसभा के चुनाव हैं। 2014 में केंद्र में धमाकेदार जीत के बाद भी 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा को मात्र तीन सीटें मिली थीं। इसलिए अब दिल्ली विधानसभा का चुनाव नड्डा की पहली परीक्षा होगा। इसी साल बिहार में विधानसभा चुनाव हैं। अगले साल पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु सहित जिन राज्यों में चुनाव हैं, उनकी दिशा तय करने में बिहार विधानसभा चुनाव महत्त्वपूर्ण होंगे। नड्डा के लिए उन सारे राज्यों को, जहां भाजपा सत्ता में नहीं है, संभालना दुष्कर इसलिए भी है कि सभी राज्यों में नागरिकता कानून को लेकर केंद्र के कदम का जोरदार विरोध हो रहा है और लोग सड़कों पर हैं। तीन बड़े राज्य राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ भाजपा पहले ही खो चुकी है। हाल में महाराष्ट्र और झारखंड के नतीजों ने भी ये साबित कर दिया है कि भाजपा का ग्राफ उतार पर है। कश्मीर के राजनीतिक घटनाक्रम भी भाजपा के लिए मामूली नहीं हैं। ऐसे में पार्टी में नया दमखम भरते हुए कैसे राज्यों को फतह किया जाएगा, ये नड्डा को सोचना होगा।

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