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संपादकीय: असुविधा का सफर

एक बड़ी विडंबना यह भी है कि ट्रेनों में इस तरह हंगामा करने और सामान्य यात्रियों को असुविधा में डालने के मामले अक्सर सामने आते रहते हैं।

Author Published on: September 12, 2019 2:00 AM
सांकेतिक तस्वीर।

भारतीय रेल को वैश्विक पैमानों के अनुरूप बनाने के दावों के बरक्स ट्रेनों में होने वाली असुविधाएं आम हैं। यों हर कुछ समय बाद ट्रेन से सफर को सुरक्षित और सहज बनाने के दावे किए जाते हैं, लेकिन उन पर अमल अब तक नहीं हो पाया है। हालत यह है कि कई बार ट्रेन में सफर करने वाले विशिष्ट श्रेणी के लोगों को भी ऐसी असुविधाओं से दो-चार होना पड़ता है। ऐसे में साधारण यात्रियों को किन मुश्किलों से गुजरना पड़ता होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। गौरतलब है कि रविवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन स्टेशन से इंदौर जाने वाली इंटरसिटी एक्सप्रेस के जिस कूपे में सफर कर रहे थे, उसके बगल में ही कुछ युवक शराब पीकर हंगामा कर रहे थे।

इस पर लोकसभा अध्यक्ष ने अपने निजी सचिव को उन्हें समझाने भेजा, लेकिन युवकों ने उनके साथ भी बदतमीजी की। फिर पुलिस को सूचना दी गई और पांचों युवकों को गिरफ्तार किया गया। निश्चित रूप से लोकसभा अध्यक्ष की सक्रियता की वजह से उन युवकों के खिलाफ कार्रवाई की स्थिति बनी। मगर सवाल है कि ट्रेन के जिस डिब्बे में विशिष्ट श्रेणी के व्यक्ति सफर कर रहे हों, उसमें टिकट निरीक्षक से लेकर सुरक्षाकर्मी कहां थे और क्या कर रहे थे!

एक बड़ी विडंबना यह भी है कि ट्रेनों में इस तरह हंगामा करने और सामान्य यात्रियों को असुविधा में डालने के मामले अक्सर सामने आते रहते हैं, लेकिन आमतौर पर यात्री ऐसी हरकतों को अनदेखा कर देते हैं। जब तक हंगामा करने वालों के खिलाफ आवाज नहीं उठाई जाती, तब तक ऐसे लोग अपनी मनमानी करते रहते हैं। साधारण लोगों की ओर से ऐसी हरकतों की अनदेखी किए जाने के पीछे उत्पाती तत्त्वों से उलझने और कानूनी कार्रवाई के झंझट से बचने को ही मुख्य कारण माना जा सकता है। कई बार शिकायत करने के बावजूद ट्रेन में मौजूद टिकट निरीक्षक और सुरक्षाकर्मियों की ओर से अपेक्षित सहायता नहीं मिल पाती है।

इंटरसिटी एक्सप्रेस में हुई ताजा घटना में भी रेलवे पुलिस शायद इसलिए तुरंत सक्रिय हुई और उत्पात मचा रहे युवकों को गिरफ्तार किया कि इसकी शिकायत देश के एक ऊंचे पद और कद वाले व्यक्ति की ओर से की गई थी। कोशिश यह होनी चाहिए कि ट्रेन में तैनात सुरक्षाकर्मियों और रेलवे कर्मचारी में यह सक्रियता उनकी ड्यूटी का हिस्सा हो, ताकि ऐसी शिकायतों की नौबत ही न आए।

दरअसल, ज्यादातर ट्रेनों की लेट-लतीफी और कई तरह की असुविधाओं के अलावा एक बड़ी समस्या अक्सर चलती गाड़ियों में उत्पाती तत्त्वों का हंगामा, महिलाओं से छेड़छाड़ और लूटपाट की घटनाएं हैं। यही वजह है कि ट्रेनों में सुरक्षा इंतजामों पर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन लगता है कि रेल महकमे की नजर में इनकी कोई खास अहमियत नहीं है।

आमतौर पर जब भी ऐसी कोई घटना सुर्खियों में आती है तो एक रटा-रटाया आश्वासन यही जारी किया जाता है कि ताजा घटना के मद्देनजर रेल महकमा सुरक्षा के इंतजाम करेगा और भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए जरूरी कदम उठाएगा। लेकिन आए दिन होने वाली ऐसी घटनाएं उन आश्वासनों की हकीकत बताती हैं। विचित्र है कि बुलेट ट्रेन जैसी परियोजनाएं और रेलवे को अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाने के दावे किए जाते हैं, सुरक्षा के नाम पर पैसे वसूले जाते हैं, लेकिन यह सुनिश्चित करना जरूरी नहीं समझा जाता कि यात्रियों का सफर कैसे सुरक्षित पूरा हो!

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