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संपादकीय: हड़बड़ी का हासिल

यह किसी से छिपा नहीं है कि ट्विटर या फेसबुक जैसे सोशल मीडिया के मंचों पर की जाने वाली हल्की-फुल्की टिप्पणियां बेहद आम हैं और उनमें से ज्यादातर अपने असर में कोई खास अहमियत नहीं रखतीं।

Author June 12, 2019 1:07 AM
पत्रकार प्रशांत कनौजिया। (Source: Facebook/Prashant Kanojia)

दिल्ली में एक पत्रकार की गिरफ्तारी के मसले पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने जो टिप्पणी की है, उससे एक बार फिर यही स्पष्ट हुआ है कि सरकारों और खासतौर पर उनकी पुलिस को किसी मसले पर कार्रवाई के दौरान किन मानकों का ध्यान रखना चाहिए। गौरतलब है कि हाल में एक पत्रकार प्रशांत कनौजिया ने अपने ट्विटर अकाउंट पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बारे में कुछ टिप्पणी करती हुई एक महिला के वीडियो के साथ-साथ एक निजी टिप्पणी भी कर दी थी। इसे अभद्र और योगी आदित्यनाथ को बदनाम करने वाला बताते हुए इसके खिलाफ शिकायत दर्ज की गई। इस पर उत्तर प्रदेश की पुलिस ने जिस तरह आनन-फानन में कार्रवाई करते हुए दिल्ली से प्रशांत को गिरफ्तार कर लिया, वह अपने आप में यह बताने के लिए काफी था कि इस मामले में संवैधानिक व्यवस्था या कानून का खयाल कम किया गया था और धौंस जमाने को ज्यादा तरजीह दी गई थी। इस जल्दबाजी पर पहला सवाल यही उठा कि सरकार के तहत संगठित और पेशेवर तरीके से काम करने वाली पुलिस इतने अगंभीर तरीके से हड़बड़ी कैसे कर सकती है! क्या गिरफ्तारी के बिना इस मसले पर कानून प्रक्रिया नहीं अपनाई जा सकती थी?

जाहिर है, इस पर समूचे पत्रकारिता जगत में तीखे सवाल उठे और लोगों ने सरकार के कामकाज के तौर-तरीके को कठघरे में खड़ा किया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने साफ राय जाहिर की है कि ट्विटर पर की गई उस टिप्पणी के गुण-दोष का सवाल अलग है, लेकिन किसी भी राय के आधार पर इस तरह गिरफ्तारी सही नहीं है। अदालत ने कहा कि नागरिक की स्वतंत्रता उनका अधिकार है और उससे कोई समझौता नहीं किया जा सकता। इसकी गारंटी संविधान में दी गई है और इसका हनन नहीं किया जा सकता। हालांकि इस मामले में दर्ज शिकायत पर मुकदमा चलता रहेगा। यानी सुप्रीम कोर्ट ने सरकार या उसकी पुलिस को यह बताने की कोशिश की है कि उसे अपनी संवैधानिक या कानूनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए जरूरी गंभीरता बरतनी चाहिए। लेकिन यह समझना मुश्किल है कि कई बार सोशल मीडिया पर की जाने वाली टिप्पणियों पर दर्ज शिकायतों पर पुलिस की ओर से गैरजरूरी हड़बड़ी का प्रदर्शन क्यों किया जाता है। जबकि ऐसी हड़बड़ी का खमियाजा इस रूप में उठाना पड़ता है कि अदालत में कानूनी कसौटी पर ऐसे मामले कमजोर साबित होते हैं।

यह किसी से छिपा नहीं है कि ट्विटर या फेसबुक जैसे सोशल मीडिया के मंचों पर की जाने वाली हल्की-फुल्की टिप्पणियां बेहद आम हैं और उनमें से ज्यादातर अपने असर में कोई खास अहमियत नहीं रखतीं। इन मंचों पर जो राय जाहिर की जाती है, उसमें किसी अनुशासन की उम्मीद इसलिए बेमानी है कि उसे किसी निजी जगह के रूप में देखा जाता रहा है और वहां लोग किसी सीमा का खयाल रखना जरूरी नहीं समझते। हालांकि निश्चित रूप से यह अपेक्षा वाजिब है कि जानबूझ कर किसी की छवि को नुकसान पहुंचाने की मंशा से कोई गैरजिम्मेदाराना टिप्पणी नहीं की जाए। मगर सच यह है कि वहां कोई व्यक्ति बहुत सलीके से एक जरूरी बात भी कहता है तो दूसरा शख्स बेहद अगंभीर तरीके से सतही टिप्पणी कर देता है। वहां अक्सर बड़े नेताओं या राजनीतिक गतिविधियों पर हल्के-फुल्के अंदाज में बातें की जाती हैं। लेकिन शासन का अपना एक ढांचा है और उसके कामकाज करने के तौर-तरीके निर्धारित हैं। संवैधानिक नियम-कायदों से बंधे शासन को उसकी गरिमा का खयाल रखना चाहिए। नेताओं और राजनीतिकों को भी देश की लोकतांत्रिक परंपरा और नागरिक स्वतंत्रता की संवैधानिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए उदार रवैये का परिचय देना चाहिए।

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