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खुदकुशी और सबक

जवाहर नवोदय विद्यालयों में छात्र-छात्राओं की आत्महत्या के मामले में अगर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सख्त रुख नहीं अपनाया होता तो शायद सरकार की आंखें नहीं खुलतीं। न ही देश को पता चलता कि ग्रामीण प्रतिभाओं को सामने लाने के मकसद से शुरू किए गए ये विद्यालय अब जितने शिक्षा के केंद्र हैं, शायद उतने ही छात्रों को जान देने पर मजबूर करने की जगह बन रहे हैं।

Author January 5, 2019 2:58 AM
जवाहर नवोदय विद्यालय (जेएनवी), फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

जवाहर नवोदय विद्यालयों में छात्र-छात्राओं की आत्महत्या के मामले में अगर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सख्त रुख नहीं अपनाया होता तो शायद सरकार की आंखें नहीं खुलतीं। न ही देश को पता चलता कि ग्रामीण प्रतिभाओं को सामने लाने के मकसद से शुरू किए गए ये विद्यालय अब जितने शिक्षा के केंद्र हैं, शायद उतने ही छात्रों को जान देने पर मजबूर करने की जगह बन रहे हैं। चार साल यानी 2013 से 2017 के दौरान उनचास बच्चों की खुदकुशी हैरान करने वाली है। इस बात का खुलासा एक आरटीआइ से हुआ वरना किसी को भनक भी नहीं लगती कि नवोदय विद्यालयों में प्रतिभाएं जान दे रही हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने हाल में मानव संसाधन विकास मंत्रालय को नोटिस जारी कर छह हफ्ते के भीतर इस मामले में जवाब मांगा है। ताज्जुब की बात तो यह है कि पिछले चार साल में जब-जब ऐसी घटनाएं हुर्इं, तब इन विद्यालयों को संचालित करने वाले शीर्ष निकाय ने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। इससे पता चलता है कि हमारा सरकारी तंत्र किस कदर गैर-जिम्मेदार है जिस पर इतने बच्चों की मौत के बाद भी कोई असर नहीं हुआ, न ही इस बात की गहराई से छानबीन करने की कोशिश की गई कि आखिर क्यों बच्चे ऐसा आत्मघाती कदम उठाने को मजबूर हो रहे हैं।

नवोदय विद्यालयों की स्थापना तीन दशक पहले बनी नई राष्ट्रीय शिक्षा के तहत की गई थी, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में रह रहे गरीब बच्चों को गुणवत्तापरक शिक्षा दी सके। इसमें कोई दो राय नहीं कि स्कूली शिक्षा में यह प्रयोग अपना लक्ष्य हासिल करने में काफी हद तक सफल भी रहा है। नवोदय विद्यालयों का परिणाम इनकी सफलता बताने के लिए पर्याप्त है। लेकिन पिछले कुछ सालों की घटनाएं बता रही हैं कि यहां सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। इन विद्यालयों को भी उन दूसरे शिक्षण संस्थानों का वह रोग लग गया है जिसकी वजह से विद्यार्थी अपना भविष्य बनाने के बजाय जान देने को मजबूर हो रहे हैं। चौंकाने वाली तो यह है कि चार साल के दौरान जितने छात्रों ने जान दी उनमें से पच्चीस यानी आधे बच्चे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के थे। लैंगिक आधार पर देखें तो पैंतीस छात्रों और चौदह छात्राओं ने जान दी। उनचास में से बयालीस बच्चों ने फांसी लगा कर खुदकुशी थी। जाहिर है, इन घटनाओं को बहुत ही हल्के में लिया गया।

देश भर में इस वक्त छह सौ पैंतीस जवाहर नवोदय विद्यालय हैं और इनमें करीब दो लाख अस्सी हजार बच्चे पढ़ रहे हैं। इन विद्यालयों की कमान नवोदय विद्यालय समिति के हाथ है जो मानव संसाधन विकास मंत्रालय के तहत एक स्वायत्तशासी निकाय है। ऐसे में क्या इस स्वायत्तशासी निकाय की जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि जब बच्चों की खुदकुशी की घटनाएं सामने आनी शुरू हुर्इं तो गहराई से छानबीन की जाती और एहतियाती कदम उठाए जाते? इन घटनाओं के पीछे जो संभावित कारण बताए जा रहे हैं उनमें एकतरफा प्यार, पारिवारिक समस्याएं, शिक्षकों की प्रताड़ना, पढ़ाई का दबाव, छात्रों में आपसी झगड़े आदि मुख्य हैं। सवाल यह है कि नवोदय विद्यालय समिति और स्कूल प्रशासन ऐसी घटनाओं से आंखें क्यों मूंदे रहे। अगर हर मामले में गहराई से जांच की जाती तो समस्या की तह तक पहुंचा जा सकता था, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने में मदद मिलती। सरकार ने अब इन घटनाओं की जांच के लिए समिति बनाई है और हर स्कूल में काउंसलर नियुक्त करने की बात कही है। अगर इतनी सतर्कता पहले दिखाई जाती तो शायद कई प्रतिभाओं को बचाया जा सकता था!

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