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संपादकीय: नशे का दलदल

पार्टी में शराब के अलावा हुक्के, तंबाकू, स्मोकर कोल व अन्य नशीली चीजें भी मिलीं। दिल्ली में आए दिन तस्करी करके लाए गए मादक पदार्थों की खेपों का पकड़ा जाना बताता है कि एनसीआर नशीली दवाओं के कारोबार के केंद्र में तब्दील हो चुका है।

बीते दिनों छापेमारी के दौरान फार्म हाउस में रेव पार्टी कर रहे 161 लड़के और 31 लड़कियां पकड़ी गईं। ( प्रतीकात्मक तस्वीर)

दिल्ली और आसपास के इलाकों में अक्सर चलने वाली रेव पार्टियों से यही लगता है कि हमारे किशोर और नौजवान किस तरह नशे के सौदागरों के जाल में फंस चुके हैं। दिल्ली के बाहरी इलाकों में स्थित ज्यादातर फार्म हाउस, होटल, रेस्टोरेंट रात भर चलने वाली ऐसी पार्टियों के ठिकाने बने हुए हैं। सबसे ज्यादा चिंताजनक पहलू तो यह है कि रेव पार्टियों के इस कारोबार को पुलिस का भी संरक्षण हासिल होता है। पहले तो पुणे, मुंबई जैसे महानगर और गोवा जैसे तटीय पर्यटन स्थल ही इन पार्टियों के लिए बदनाम थे, लेकिन पिछले कुछ सालों के भीतर दिल्ली और एनसीआर में ऐसी पार्टियों का चलन तेजी से बढ़ा है। तीन दिन पहले ही नोएडा के एक इलाके में रेव पार्टी पर छापा मार कर पुलिस ने एक सौ बानवे लोगों को पकड़ा। इनमें एक सौ इकसठ नौजवान और इकतीस युवतियां शामिल थीं। नौजवानों का मनोरंजन करने के लिए किराए पर अन्य एजेंसियों से युवतियों को बुलाया गया था। इस पार्टी में शराब के अलावा हुक्के, तंबाकू, स्मोकर कोल व अन्य नशीली चीजें भी मिलीं। दिल्ली में आए दिन तस्करी करके लाए गए मादक पदार्थों की खेपों का पकड़ा जाना बताता है कि एनसीआर नशीली दवाओं के कारोबार के केंद्र में तब्दील हो चुका है।

यह वाकई चिंताजनक है कि रेव पार्टियां एक बड़े संरक्षित कारोबार का रूप ले चुकी हैं। इनके पीछे मादक पदार्थों का धंधा करने वालों का एक बड़ा नेटवर्क काम करता है, यह किसी से छिपा नहीं है। बिना पुलिस की मिलीभगत से ऐसे धंधे नहीं चल नहीं सकते। तो फिर रेव पार्टियों के धंधे को फलने-फूलने से कौन रोक पाएगा? ऐसी पार्टियों के लिए सोशल मीडिया और खास एजेंटों के जरिए ग्राहकों को फंसाया जाता है। इनमें सबसे बड़ा वर्ग नौजवानों और खासतौर से उन छात्रों का होता है जो अमीर घरों से आते हैं और अपने शौक, मौजमस्ती पर भारी रकम खर्च करने से कोई परहेज नहीं करते। रेव पार्टी में शामिल होने लिए खासी मोटी रकम, जो दस हजार से लेकर पचास हजार और इससे भी ज्यादा होती है, वसूली जाती है। बाजार से कई गुना ज्यादा कीमत पर नशीले पदार्थ बेचे जाते हैं। कारोबारी और रसूखदार लोग भी ऐसी पार्टियों के ग्राहक होते हैं। ऐसे में रेव पार्टियों पर कार्रवाई करना मुश्किल हो जाता है। कभी-कभार पुलिस छापों की ऐसी कार्रवाई का दिखावा करती है तो इसका मकसद यही होता है कि वह सतर्क है। लेकिन हकीकत तो कुछ और कहती है।

दरअसल, रेव पार्टियों को लेकर सबसे ज्यादा कठघरे में तो पुलिस ही है, जिसके पास शक्तियों की कोई कमी नहीं है। लेकिन पूरे एनसीआर में जिस तरह ऐसी खास मनोरंजक पार्टियों का बेखौफ धंधा चल रहा है, वह पुलिस की मेहरबानी से ही चल रहा है। सवाल है कि क्या पुलिस को मादक पदार्थों का धंधा करने वालों के बारे में पता नहीं होता? क्या पुलिस इस बात से अनजान रहती है कि कहां पार्टी चल रही है? अगर ऐसा है तो यह पुलिस की कार्यप्रणाली पर ही सबसे बड़ा सवालिया निशान है। आमतौर पर यह धारणा है और काफी हद तक सच्चाई भी कि अवैध कारोबार बिना पुलिस की मर्जी के नहीं चल पाते। सारे अवैध कारोबारों में, चाहे वे रेव पार्टी चलाने वाले हों या नशीली दवाओं की आपूर्ति करने वाले या फिर अन्य गैरकानूनी काम करने वाले, सब पुलिस को हिस्सा देते हैं। ऐसे में न सिर्फ ये धंधे पनपेंगे, बल्कि नौजवानों को भी तबाह करेंगे। सोचने की जरूरत यह है कि ऐसी रेव पार्टियों के असर की अनदेखी के समांतर हमारी एक समूची पीढ़ी कहां जाएगी!

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