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संपादकीय: गहराता अफगान संकट

चीन और रूस जैसे देश अमेरिका को अफगानिस्तान में उलझा रहने देना चाहते हैं जिससे उसे आर्थिक नुकसान होता रहे। अफगानिस्तान की अस्थिरता पाकिस्तान के लिए इसलिए लाभप्रद है कि इससे अमेरिका उस पर निर्भर बना रहे और इसके एवज में उसे आर्थिक और सामरिक सहायता मिलती रहे। अफगानिस्तान में पाकिस्तान समर्थित शासन को बढ़ावा देने की पाकिस्तान की पुरानी नीति रही है।

Author Published on: September 11, 2019 2:02 AM
सांकेतिक तस्वीर।

ब्रह्मदीप अलूने
अफगानिस्तान से आतंक का खात्मा करने का दु:स्वप्न पाले अमेरिका अपनी मजबूत सेना के साथ अठारह साल से इस देश में है, लेकिन उसके लिए तालिबान एक ऐसी अबूझ पहेली है जिससे पार पाने में दुनिया की महाशक्ति अभी तक नाकाम रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हिंसक तालिबान को बातचीत की मेज पर लाकर पिछले कुछ सालों से अफगानिस्तान में शांति स्थापित करने की जो उम्मीदें जगाई थीं, लगता है वे अब ध्वस्त हो गई हैं। दरअसल, चारों ओर मैदानों से घिरा अफगानिस्तान लगभग चार दशकों से आंतरिक अशांति का दंश झेल रहा है। दुनिया के हस्तक्षेप और महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता में जकड़ा यह देश बदहाली और बर्बादी के कगार पर है। इस समय अफगानिस्तान तालिबान, इस्लामिक स्टेट (आइएस), अफगान फौज, अमेरिकी नेतृत्व में नाटो सेना और पाकिस्तान की संदिग्ध रणनीतिक गतिविधियों के बीच का ऐसा रणक्षेत्र बन गया है जहां पर सिर्फ अनिश्चितता दिखाई देती है।

अफगानिस्तान से आतंक खत्म करने के लिए 2001 में शुरू हुए अमेरिकी अभियान को समाप्त करने के लिए दृढ़ संकल्पित डोनाल्ड ट्रंप ने हिंसक आतंकी संगठन तालिबान के प्रभाव को स्वीकार करते हुए उससे बातचीत करने का साहस दिखाने से भी गुरेज नहीं किया था। अफगानिस्तान में इस समय चौदह हजार अमेरिकी सैनिक तैनात हैं और उनकी देश वापसी को लेकर तालिबान से वार्ता चल रही थी। इसी सिलसिले में अमेरिका और तालिबान के बीच कतर में अब तक नौ दौर की शांति वार्ता हो चुकी थी और कैंप डेविड में अमेरिकी राष्ट्रपति को तालिबान के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत करनी थी। लेकिन काबुल में पिछले हफ्ते हुए तालिबान के बड़े आतंकी हमले में अमेरिकी सैनिक की मौत से नाराज ट्रंप ने तालिबान से वार्ता को खत्म करने की घोषणा कर दी।

ट्रंप ने अपनी ताजा नीति को साफ करते हुए कहा कि अफगानिस्तान में अठारह साल से जारी युद्ध को खत्म करने के इरादे से तालिबान के साथ जो बातचीत हो रही थी, वह ‘मर’ चुकी है। हालांकि अफगानिस्तान में शांति स्थापना को लेकर अमेरिका की तालिबान से बातचीत की आलोचना कर रही अफगान सरकार ने ट्रंप की घोषणा का स्वागत किया है।

इस समूचे घटनाक्रम से अफगानिस्तान में शांति की उम्मीदों पर सवालिया निशान लग गया है। इसके दूरगामी परिणाम भारत सहित दुनिया को प्रभावित करने वाले हैं। इस तथ्य को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि अफगानिस्तान में आतंक का खात्मा न होने के बहुत से रणनीतिक और वैश्विक कारण रहे हैं। वैश्विक सहायता प्राप्त अफगानिस्तान की सरकारी सेना के तमाम प्रतिरोध के बाद भी वर्तमान में देश के एक तिहाई हिस्से पर तालिबान का कब्जा है और दक्षिणी अफगानिस्तान में भी वह मजबूत स्थिति में है। अफगान मैदान में तालिबान के मजबूती से जमे रहने में रूस सहित पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल उठते रहे हैं।

तालिबान से जूझती अमेरिकी और अफगान फौजों के लिए दूसरी चुनौती आइएस की है। जनवरी, 2015 में आइएस ने अपनी खुरासान शाखा स्थापित की थी। खुरासान एक पुराना नाम है जिसके दायरे में अफगानिस्तान और आसपास का इलाका आता है। आइएस ने अरब जगत से बाहर अपने पैर पसारने की कोशिशों के तहत बहुत कम समय में अफगानिस्तान के कम से कम पांच प्रांतों- हेलमंद, जाबुल, फराह, लोगार और नंगरहार में अपनी मौजूदगी का अहसास कराया है। आइएस अफगान तालिबान लड़ाकों को खदेड़ना चाहता है और यह भी चाहता है कि तालिबान-अलकायदा गठबंधन में शामिल लड़ाके उसका हाथ थाम लें, लेकिन स्थानीय समर्थन और राजनीतिक बल हासिल करने की इस कवायद में आइएस को तालिबान से जबर्दस्त संघर्ष करना पड़ रहा है।

दूसरी ओर, दक्षिण और मध्य एशियाई देशों में सक्रिय आइएस से सहानुभूति रखने वाले कट्टरपंथी मौजूद हैं। इस क्षेत्र के विभिन्न देशों अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भारत, कजाखस्तान, किर्गिजस्तान, पाकिस्तान, ताजिकिस्तान, तुकर्मेनिस्तान और उज्बेकिस्तान जैसे देशों से कुल मिला कर हजारों लोग आइएस के समर्थन में लड़ने के लिए सीरिया और इराक जा चुके हैं। ऐसे में आइएस ने उत्तरी अफगानिस्तान में अपने पैर जमाने की कोशिशें जारी रखी हैं ताकि वह मध्य एशिया, चेचन और चीनी वीगर उग्रवादियों से गठजोड़ कर सके।

यहां रूस की भूमिका रणनीतिक दृष्टि से बेहद खतरनाक है। अमेरिका के सैन्य अधिकारियों को शक है कि रूस तालिबान को हथियार देता है। कुछ विश्लेषकों के मुताबिक रूस पूर्वी अफगानिस्तान में तथाकथित आइएस के उदय को रोकने के लिए तालिबान की तरफ हाथ बढ़ा रहा है। रूस को डर है कि मध्य एशिया से होते हुए इस्लामिक चरमपंथी हिंसा कहीं रूस तक न पहुंच जाए।

अफगानिस्तान में तालिबान को लेकर पाकिस्तान की भूमिका बेहद संदिग्ध रही है। वहां अलकायदा का नेटवर्क पाकिस्तान ने ही बनवाया। अफगानिस्तान में अनेक आतंकी हमलों में पाकिस्तान की भूमिका पुख्ता सबूतों के साथ कई बार सामने आई है। विकिलीक्स की एक रिपोर्ट में अफगानिस्तान में पाकिस्तान के आतंकवादियों से गहरे संबंधों और उनकी दोहरी भूमिका का खुलासा किया गया था। इस रिपोर्ट के अनुसार गुल समेत आइएसआइ के कई मौजूदा और पूर्व अधिकारी पेशावर के पास मदरसों में गए और अफगानिस्तान में फिदायीन हमलों के लिए लड़कों को नियुक्त किया था।

जुलाई और अगस्त 2008 में अफगान खुफिया सूत्रों ने अमेरिका को जानकारी दी थी कि करजई की हत्या की साजिश पाकिस्तान में रची गई थी और इसका ताना-बाना बुनने वाले आइएसआइ के एक नामी अधिकारी थे। करजई पर हमले में शामिल तीन आतंकवादियों को आइएसआइ के एक नामी अधिकारी ने तैयार किया और उन्हें कराची के जर्ब मोमिन शिविर में प्रशिक्षित किया गया था।

साल 2011 में भी अमेरिका के गोपनीय दस्तावेजों में ग्वांतानामो खाड़ी के कैदियों से बातचीत के आधार पर यह खुलासा हुआ कि पाक की खुफिया एजेंसी आइएसआइ अफगानिस्तान में अमेरिकी गठबंधन सेनाओं से लड़ रहे विद्रोहियों, यहां तक कि अलकायदा को समर्थन देती है, उनकी गतिविधियों का समन्वय करती है और उन्हें संरक्षण प्रदान करती है। इन दस्तावेजों में आइएसआइ को आतंकवादी संगठन करार देते हुए माना है कि यह अलकायदा और तालिबान के समान ही एक चुनौती है।

अफगानिस्तान में शांति और विकास की वैश्विक कोशिशें धराशायी हो रही हैं। साल 2012 में टोक्यो वार्ता के बाद अफगानिस्तान को व्यापक सहायता मिली। इस सहायता के कारण गृह युद्ध से जूझते इस देश में शिक्षा, स्वास्थ्य और संचार की बेहतर सुविधाएं उपलब्ध हुर्इं, बल्कि बुनियादी ढांचे का भी विकास हुआ। बेहतर सड़कों का जाल बिछाया गया और बिजली आपूर्ति का नेटवर्क खड़ा किया गया। भारत ने अफगानिस्तान के स्थायी विकास के लिए व्यापक अभियान चलाया और कृषि, उत्खनन, स्वास्थ्य क्षेत्र, प्रौद्योगिकी और प्रशिक्षण में व्यापक सहयोग किया। इन तमाम प्रयासों के बाद भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अफगानिस्तान एक असफल देश बन गया है जहां आंतरिक विधि व्यवस्था कायम करना भी बड़ी चुनौती है।

चीन और रूस जैसे देश अमेरिका को अफगानिस्तान में उलझा रहने देना चाहते हैं जिससे उसे आर्थिक नुकसान होता रहे। अफगानिस्तान की अस्थिरता पाकिस्तान के लिए इसलिए लाभप्रद है कि इससे अमेरिका उस पर निर्भर बना रहे और इसके एवज में उसे आर्थिक और सामरिक सहायता मिलती रहे। अफगानिस्तान में पाकिस्तान समर्थित शासन को बढ़ावा देने की पाकिस्तान की पुरानी नीति रही है। तालिबान को आइएसआइ का भाग समझा जाता है और उसकी जड़ें पाकिस्तान में ही हैं।

भारत और ईरान के लिए अफगानिस्तान में शांति की स्थापना पाकिस्तान को सामरिक रूप से दबाने के लिए अपरिहार्य है। कश्मीर में स्थायी शांति की स्थापना और भारत में आतंकवाद को रोकने के लिए भी तालिबान का खात्मा जरूरी है। इसलिए भारत तालिबान को उखाड़ फेंकने, अफगानिस्तान में शांति की स्थापना के साथ लोकतांत्रिक और स्थायी सरकार का समर्थक है। बहरहाल, अफगानिस्तान में स्थिरता विश्व शांति के लिए बेहद जरूरी है। पर यह शांति कैसे आएगी, इसका किसी के पास जवाब नहीं है।

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