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संपादकीय: इलाज के बजाय

अगर पीड़ित के पास आधार कार्ड नहीं है तो उसे रेबीज-निरोधी टीका नहीं लगाया जाएगा। यानी अगर कोई व्यक्ति आपात स्थिति में अपने साथ आधार कार्ड नहीं ला सका तो उसे जान जाने के जोखिम को अपने स्तर पर झेलना होगा।

Author May 18, 2019 2:47 AM
आधार कार्ड (प्रतीकात्मक तस्वीर- इंडियन एक्सप्रेस)

इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि कोई व्यक्ति जीवन बच सकने की उम्मीद में अस्पताल पहुंचे और वहां इलाज करने के बजाय उसे सिर्फ इसलिए लौटा दिया जाए कि उसके पास आधार कार्ड न हो। एक खबर के मुताबिक उत्तर प्रदेश में नोएडा के जिला अस्पताल में यह नई व्यवस्था लागू की गई है कि अगर किसी व्यक्ति को कुत्ता, बिल्ली, बंदर आदि ने काट लिया है और वह रेबीज का टीका लगवाने वहां आता है तो उसके पास आधार कार्ड होना अनिवार्य है। अगर पीड़ित के पास आधार कार्ड नहीं है तो उसे रेबीज-निरोधी टीका नहीं लगाया जाएगा। यानी अगर कोई व्यक्ति आपात स्थिति में अपने साथ आधार कार्ड नहीं ला सका तो उसे जान जाने के जोखिम को अपने स्तर पर झेलना होगा। इस नए नियम को लागू करने का यह कारण भी विचित्र बताया गया है कि चूंकि रेबीज-निरोधी टीके की मांग में काफी बढ़ोतरी हुई है और इस टीके का स्टॉक खत्म होने के कगार पर पहुंच गया है, इसलिए आधार कार्ड की अनिवार्यता लागू कर मांग को सीमित किया जाएगा। सवाल है कि रेबीज-निरोधी टीकों की मांग किन स्थितियों में बढ़ सकती है?

यह किसी से छिपा नहीं है कि रेबीज एक जानलेवा बीमारी है और इसके पीड़ित को अगर वक्त पर सही इलाज नहीं मिले तो उसकी मौत हो सकती है। अगर किसी को कुत्ता, बिल्ली या बंदर जैसे रेबीज के जोखिम वाला जानवर काटेगा तभी वह इसका टीका लेने अस्पताल जाएगा। ऐसे में अस्पताल की जिम्मेदारी क्या होनी चाहिए? सामान्य स्थितियों में भी अगर कोई व्यक्ति किसी हादसे का शिकार होकर या तबियत ज्यादा बिगड़ जाने की वजह से अस्पताल पहुंचता है तो वहां मौजूद डॉक्टरों को बिना अड़चन के सबसे पहले उसका इलाज करना चाहिए। यह न केवल मानवीय आधार पर प्राथमिक दायित्व होना चाहिए, बल्कि पेशेगत नैतिकता और जिम्मेदारी का भी यही तकाजा है। लेकिन बेतुकी शर्त लगा कर मुश्किल स्थिति में पड़े किसी मरीज की जान पर आए जोखिम को और बढ़ाने में भूमिका निभा कर अस्पताल प्रबंधन या संबंधित महकमे ने क्या संदेश देने की कोशिश की है? इससे पहले हाल ही में आगरा के जिला अस्पताल में भी इसी तरह का नियम लागू किया गया है। खतरनाक जानवरों द्वारा काटे जाने का जोखिम कम या खत्म करने और उचित इलाज के लिए संसाधनों की कमी को पूरा करने के बजाय उसकी मांग को नियंत्रित करने के लिए आधार कार्ड साथ लाने की अनिवार्यता लागू करके सरकारी तंत्र की ओर से यह कैसी जिम्मेदारी का उदाहरण पेश किया जा रहा है?

यह कैसे सुनिश्चित होगा कि जिस वक्त अचानक ही कुत्ते, बिल्ली, बंदर ने किसी व्यक्ति को काट लिया तो उस वक्त उसके पास आधार कार्ड हो ही? क्या इस तरह का कानूनी निर्देश अस्तित्व में है कि हरेक व्यक्ति को हर वक्त अपने पास आधार कार्ड रखना होगा? आज भी देश में ऐसे काफी लोग हैं जिनका आधार कार्ड नहीं बना है। तो क्या इस नए नियम के तहत यह बताने की कोशिश की जा रही है कि घटना के वक्त या किन्हीं कारणों से नहीं बन पाने की वजह से जिनके पास आधार कार्ड नहीं है, उन्हें अपना इलाज कराने का अधिकार नहीं है? जब से देश में कई कल्याण योजनाओं में आधार कार्ड की अनिवार्यता को लागू किया गया है, तब से कई तरह की गड़बड़ियों के चलते लोगों को सुविधाओं से वंचित करने के मामले अक्सर सामने आते रहे हैं। अफसोस की बात है कि अब जान पर जोखिम की हालत से गुजरते मरीजों के इलाज के मामले में भी इस तरह की व्यवस्था लागू की जा रही है।

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