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संपादकीय: पाबंदी के बजाय

देश फिलहाल पहले ही आर्थिक मंदी और तेजी से बढ़ती बेरोजगारी की गंभीर समस्या से दो-चार है।

Author Published on: October 3, 2019 2:05 AM
जाहिर है, एक बार इस्तेमाल में आने वाले प्लास्टिक पर आम लोगों से लेकर बाजार तक जिस पैमाने पर निर्भर हो गया है, उसमें इस पर अचानक पाबंदी के बाद जटिल हालात पैदा होंगे।

इस बात से शायद ही किसी को असहमति होगी कि प्लास्टिक के बढ़ते बेलगाम इस्तेमाल ने आज समूचे पर्यावरण के सामने एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। इससे न केवल जल, वायु और जमीन को दीर्घकालिक नुकसान हो रहा है, बल्कि इससे उपजी मुश्किल को आम लोग रोजमर्रा की जिंदगी में भी महसूस कर रहे हैं। इसके बावजूद न तो लोगों के स्तर पर इसके प्रयोग से बचने की कोशिश होती है, न सरकार की ओर से इस पर कोई ठोस कार्ययोजना अमल में आ पाती है। हाल के वर्षों में प्लास्टिक से पर्यावरण को होने वाले व्यापक नुकसान के मद्देनजर इस पर प्रतिबंध लगाने का मुद्दा दुनिया भर में चर्चा का विषय बना है।

इसी क्रम में हमारे देश में भी स्वच्छ भारत अभियान के तहत दो अक्तूबर यानी गांधी जयंती के दिन से एक बार इस्तेमाल में आने वाले प्लास्टिक पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की घोषणा हुई थी। लेकिन इस महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रम के पीछे अच्छी मंशा होने के बावजूद यह सच है कि पाबंदी और उससे उपजी स्थितियों का आसानी से सामना करने की तैयारी अभी पूरी नहीं हो पाई थी। इसलिए फिलहाल सरकार ने प्लास्टिक के इस्तेमाल को हतोत्साहित करने के लिए जन-जागरूकता फैलाने का अभियान चलाने पर जोर दिया है।

यह किसी से छिपा नहीं है कि लंबे समय से इसके नुकसान की अनदेखी के नतीजे में रोजमर्रा की आम जिंदगी में प्लास्टिक का उपयोग व्यापक स्तर पर घुल-मिल चुका है और इसकी जरूरतें पूरी करने के लिए प्लास्टिक की वस्तुएं तैयार करने का एक बड़ा बाजार खड़ा हो चुका है। ऐसे में अगर प्लास्टिक पर अचानक ही पाबंदी लगाई जाती है तो आम जनजीवन पर इसका असर पड़ने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर कई दूसरी गंभीर समस्याएं खड़ी हो सकती हैं। अगर अचानक ही ऐसा प्रतिबंध लगाया जाता है तो प्लास्टिक की वस्तुएं तैयार करने के काम में लगी लगभग दस हजार औद्योगिक इकाइयां बंद हो जाएंगी और पांच लाख से ज्यादा लोग बेरोजगार हो जाएंगे।

देश फिलहाल पहले ही आर्थिक मंदी और तेजी से बढ़ती बेरोजगारी की गंभीर समस्या से दो-चार है। ऐसे में पाबंदी के सवाल पर अगर जरूरत से ज्यादा सख्ती बरती जाती तो शायद स्थितियां और विकट हो जातीं। कहा जा सकता है कि मकसद में अच्छा होने के बावजूद एक बार इस्तेमाल में आने वाले प्लास्टिक को पूरी तरह प्रतिबंधित करना व्यावहारिक नहीं होगा।

जाहिर है, एक बार इस्तेमाल में आने वाले प्लास्टिक पर आम लोगों से लेकर बाजार तक जिस पैमाने पर निर्भर हो गया है, उसमें इस पर अचानक पाबंदी के बाद जटिल हालात पैदा होंगे। इसके बावजूद यह तथ्य है कि प्लास्टिक से तैयार सामानों और खासतौर पर एक बार प्रयोग में आने वाली प्लास्टिक की वस्तुओं के इस्तेमाल से होने वाले नुकसान का दायरा काफी बड़ा हो चुका है।

शहरों-महानगरों के नालों के जाम होने से लेकर चारों तरफ पसरा कचरा एक पक्ष है तो इससे होने वाले वायु प्रदूषण से लेकर जमीन तक के बंजर होने का सवाल ज्यादा गंभीर है। इसलिए समय रहते कम से कम एक बार इस्तेमाल में आने वाले प्लास्टिक के सामान पर से निर्भरता खत्म करके दूसरे विकल्प नहीं निकाले गए तो इसका गंभीर दुष्परिणाम सबको भुगतना पड़ेगा।

अब अगर सरकार ने एक बार इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक पर पूरी तरह पाबंदी के बजाय फिलहाल इस मसले पर जन-जागरूकता फैलाने पर जोर देने का निश्चय किया है तो अब इसे महज औपचारिकता का निर्वहन करने वाली गतिविधि तक सीमित नहीं रखना होगा। लोग इसका इस्तेमाल खुद छोड़ें और इस उद्योग में लगे लोगों को रोजगार का विकल्प मिले, इसके लिए एक बड़ी योजना बनाने और उस पर ईमानदारी से अमल की जरूरत है।

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