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संपादकीय: संवेदनहीन सरकार

हालत यह है कि मुजफ्फरपुर के बालिका गृह में जिस बच्ची के खिलाफ लंबे समय तक यौन हिंसा हुई थी, उसे एक बार फिर बलात्कार का दंश झेलना पड़ा।

Author Published on: September 18, 2019 3:33 AM
सांकेतिक तस्वीर। फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

पिछले साल बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में जब एक बालिका गृह में चौंतीस लड़कियों के बलात्कार और उन पर अत्याचार का मामला सामने आया था, तो यह समूचे देश में चिंता का विषय बना था। समूची घटना के जिस तरह के ब्योरे उजागर हुए थे, उससे स्वाभाविक ही यह सवाल उठा था कि क्या किसी राज्य की सरकार इस कदर संवेदनहीन हो सकती है कि पहले ही मजबूरी और लाचारी की हालत में जी रही छोटी-छोटी बच्चियों पर अत्याचार की घटनाओं के प्रति आंखें मूंदे रहे! विडंबना यह है कि न तो पहले बिहार सरकार ने ऐसी घटनाओं की रोकथाम और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई को जरूरी समझा, न मामले के सामने आने के बाद उसे संवेदनशील होने और जिम्मेदारी निबाहने की जरूरत लगी।

हालत यह है कि मुजफ्फरपुर के बालिका गृह में जिस बच्ची के खिलाफ लंबे समय तक यौन हिंसा हुई थी, उसे एक बार फिर बलात्कार का दंश झेलना पड़ा। खबरों के मुताबिक, बेतिया में जब वह सड़क से गुजर रही थी तो चार लोगों ने उसे जबरन कार में खींच लिया और चलती गाड़ी में उससे सामूहिक बलात्कार किया। यह अपने आप में झकझोर देने वाली घटना है कि लंबे समय तक जिस यातना से गुजर कर पीड़ित लड़की किसी तरह से एक जगह से मुक्त हो सकी थी, बाहर आने के बाद उसे फिर उसी अपराध का सामना करना पड़ा।

सवाल है कि राज्य सरकार और उसके शासन-तंत्र को क्या अपनी इस जिम्मेवारी का अहसास है कि पीड़ित लड़की के खिलाफ हुए अपराध उसकी लापरवाही का नतीजा हैं? राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सोमवार को उचित ही बिहार सरकार और राज्य के पुलिस महानिदेशक को नोटिस जारी कर चार हफ्तों के भीतर जवाब मांगा है और राष्ट्रीय महिला आयोग ने मामले की जांच के लिए एक समिति गठित की है। पिछले साल जिन हालात में पीड़ित लड़की को मुजफ्फरपुर बालिका गृह से निकाला गया था, उसमें उसकी सुरक्षा, संरक्षण और उसे इंसाफ दिलाने की जवाबदेही किसकी है? बालिका गृह में लंबे समय से उतनी बड़ी तादाद में बच्चियों को कई तरह की यातनाओं से गुजरना पड़ रहा था तो वह किसकी अनदेखी का नतीजा था? जहां ऐसे आश्रय गृहों की नियमित जांच और उसमें गड़बड़ी पाए जाने पर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करना सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए थी, वहां अगर एक स्वतंत्र संस्थान-टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज सोशल ऑडिट के लिए नहीं पहुंचता तो शायद यह मामला और लंबे वक्त तक दबा रहता। क्या ऐसा इसलिए होता रहा कि इस समूचे प्रकरण में शामिल लोग ऊंचे कद के हैं और उनकी खासी राजनीतिक पैठ है? आखिर किन वजहों से सरकार ने इसके आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई करने में नरम रवैया अख्तियार किया था?

इस लिहाज से देखें तो राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की यह टिप्पणी अपने आप में हालत बताने के लिए काफी है कि बलात्कार पीड़िता राज्य सरकार की बेपरवाही की पीड़ित बन गई है; लड़की को दो बार बलात्कार का शिकार बनाया जाना बिहार में अराजकता का संकेत देता है और अपराधी कानून से बेखौफ खुल कर अपनी इच्छानुसार जघन्य अपराधों को अंजाम दे रहे हैं। गौरतलब है कि पिछले साल मामले के उजागर होने के बाद राज्य सरकार को काफी तल्ख सवालों का सामना करना पड़ा था। मगर हैरानी की बात यह है कि उसके बाद भी सरकार को संवेनदशीलता और आरोपियों के खिलाफ सख्ती बरतना जरूरी नहीं लगा। अब अगर बालिका गृह में पहले ही बलात्कार और यातना झेल चुकी लड़की को दुबारा उसी त्रासदी का सामना करना पड़ा है तो उसकी जवाबदेही किस पर आएगी?

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