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संपादकीय: संकट के सामने

रिजर्व बैंक का लक्ष्य रहता है कि महंगाई दर चार प्रतिशत से ऊपर न निकले। लेकिन जब मुद्रास्फीति इससे ऊपर निकलने लगती है तो केंद्रीय बैंक पर नीतिगत दरें बढ़ाने का दबाव बढ़ जाता है।

Author Published on: December 14, 2019 2:21 AM
बढ़ती महंगाई बता रही है कि उत्पादन से लेकर ढुलाई तक की प्रक्रिया में लागत बढ़ रही है।

केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय से देश की अर्थव्यवस्था के जो आंकड़े आ रहे हैं वे तो चिंतित करने वाले हैं ही, साथ ही खुदरा महंगाई के जो आंकड़े आए हैं, वे कहीं ज्यादा परेशान करने वाले हैं। चूंकि महंगाई का मामला सीधे आमजन से जुड़ा है, इसलिए यह गंभीर चिंता का विषय है। महंगाई बढ़ने का सीधा असर लोगों की जेब पर पड़ता है। ऐसे में अगर यह पता चले कि नवंबर में खुदरा महंगाई पिछले चालीस महीनों में सबसे ज्यादा रही, तो होश उड़ने तय हैं। इस साल नवंबर में खुदरा महंगाई की दर 5.54 फीसद रही, जबकि अक्तूबर में यह 4.62 फीसद थी और पिछले साल नवंबर में 2.33 फीसद थी। यानी महीने भर में करीब एक फीसद महंगाई बढ़ी और पिछले साल के मुकाबले दोगुनी से भी ज्यादा। छोटी-मोटी चीजों में महंगाई का भले पता न चले, लेकिन प्याज के दाम तो पिछले दो महीनों से लोगों के आंसू निकाल ही रहे हैं। खुदरा महंगाई बढ़ने का कारण खाद्य पदार्थों में तेजी बताया जा रहा है। शायद ही कोई ऐसी चीज हो जो महंगी न हुई हो। मोटे अनाज से लेकर सब्जियां, अंडे, मांस-मछली, दालें सबने लोगों की जेब से ज्यादा पैसे निकाले।

बढ़ती महंगाई बता रही है कि उत्पादन से लेकर ढुलाई तक की प्रक्रिया में लागत बढ़ रही है। इसलिए दाल-अनाज जैसी चीजों के दाम बढ़े हैं। पिछले साल जून में भी खुदरा मुद्रास्फीति पांच फीसद पर पहुंच गई थी। महंगाई चाहे थोक मूल्य सूचकांक आधारित हो या फिर खुदरा में, इसका सीधा असर तो बाजार और खरीदार पर पड़ता है। यों हमेशा मुद्रास्फीति बढ़ने का सबसे बड़ा कारण पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ना बताया जा रहा है और ऐसा होता भी है। लेकिन इस बार तो पेट्रोल और डीजल के दाम भी पिछले कुछ महीनों से एक स्तर पर ठहरे हुए हैं। ऐसे में खुदरा महंगाई बढ़ना हैरान करने वाला है। हालांकि महंगाई को काबू करने के लिए रिजर्व बैंक कदम उठाता है।

रिजर्व बैंक का लक्ष्य रहता है कि महंगाई दर चार प्रतिशत से ऊपर न निकले। लेकिन जब मुद्रास्फीति इससे ऊपर निकलने लगती है तो केंद्रीय बैंक पर नीतिगत दरें बढ़ाने का दबाव बढ़ जाता है। इसका असर यह होता है कि बैंक कर्ज सस्ता होने के आसार कम हो जाते हैं और अभी अर्थव्यवस्था के रफ्तार देने के लिए कर्ज और सस्ता करने की दिशा में विचार चल रहा है। ऐसे में महंगाई कैसे रुके, यह बड़ा सवाल है।

सिर्फ महंगाई ही नहीं, औद्योगिक उत्पादन की स्थिति संतोषजनक नहीं है। बिजली, खनन और विनिर्माण क्षेत्र में लंबे समय से जो सुस्ती बनी हुई है, उसका असर अब साफ दिख रहा है। अक्तूबर में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में 3.8 फीसद की गिरावट बता रही है कि औद्योगिक उत्पादन बढ़ने की जो उम्मीदें बनी थीं, वे हवा हो गई हैं। हालांकि सरकार ने मंदी से निपटने के लिए पिछले तीन महीनों में कई उपायों का एलान किया, जिनमें कारपोरेट करों में कटौती और बैंकों को पैकेज देने जैसेकदम भी शमिल हैं, लेकिन इनका कोई असर नहीं दिखा।

आॅटोमोबाइल और उपभोक्ता वस्तुओं का निर्माण करने वाले क्षेत्र में लंबी मंदी ने हालात बिगड़ने के संकेत पहले से दे दिए थे, लेकिन सरकार ने कई महीनों तक इनकी अनदेखी की और समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए। उनका नतीजा आज सामने है। अब भले सरकार की नींद टूटी हो, लेकिन उद्योग क्षेत्र की हालत सरकारी आंकड़े बयां कर रहे हैं। बढ़ती महंगाई और घटता उत्पादन बता रहा है कि सरकार समय रहते नहीं चेती तो हालात बेकाबू होने में देर नहीं लगेगी।

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