ताज़ा खबर
 

संपादकीय: मंदी की मार

रिजर्व बैंक पहले ही कह चुका है कि वह जरूरत को देखते हुए नीतिगत दरों में और कटौती कर सकता है। केंद्रीय बैंक इस साल पांच बार नीतिगत दरों में बदलाव कर चुका है, जो पिछले नौ साल के न्यूनतम स्तर पर जा चुकी है।

Author Published on: October 14, 2019 1:31 AM
पीएम मोदी और निर्मला सीतारमण (express file photo)

भारतीय अर्थव्यवस्था मंदी की मार से किस तरह कराह रही है, इसका पता उद्योग जगत की बिगड़ती दशा से चलता है। एक बार फिर यह निराशाजनक तस्वीर सामने आई है कि अगस्त में औद्योगिक उत्पादन 1.1 फीसद और गिर गया और पिछले इक्यासी महीनों में यह सबसे कम स्तर पर आ गया। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक बता रहा है कि कारखानों में उत्पादन काफी नीचे चला गया है और निर्माण क्षेत्र की गतिविधियां भी मंद पड़ी हुई हैं, रीयल एस्टेट में खरीदारी पर ग्रहण लगा है। यह चिंताजनक स्थिति है और हालात को काबू करने के लिए सरकार के सारे उपाय बेअसर साबित हो रहे हैं। त्योहारी महीने में अगर आर्थिक सुस्ती का ये आलम देखने-सुनने को मिले तो लोग खुश कैसे होंगे, यह सोचने वाली बात है। ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि मंदी का यह माहौल आने वाले महीनों में और हालत खराब करेगा। अगले छह-आठ महीनों में भी इस बात के आसार नहीं हैं कि कहीं से कोई सुधार या तेजी के संकेत मिलने लगें।

मंदी के संकेत साल भर पहले से मिलने लगे थे। सबसे पहले और ज्यादा असर आॅटोमोबाइल क्षेत्र में गिरावट से दिखना शुरू हो गया था। पिछले दस महीने से वाहन निर्माता कंपनियों का उत्पादन और बिक्री का ग्राफ नीचे जा रहा है। गाड़ियां बिक नहीं रहीं, इसलिए कंपनियों ने पहला कदम उत्पादन में कटौती का उठाया, इसके बाद कामगारों की छंटनी का दौर चला। लेकिन सरकार तब इसे अल्पकालिक संकट मानते हुए नजरअंदाज करती रही। उसके परिणाम आज सामने हैं। अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्र- विनिर्माण, ऊर्जा, खनन, इस्पात सब संकट में हैं। यह लगातार तीसरा महीना है जब उपभोक्ता सामान बनाने वाली कंपनियों का उत्पादन गिरता गया है। निर्माण क्षेत्र में 2014 के बाद सबसे कम वृद्धि का आंकड़ा है। खनन क्षेत्र में उत्पादन पिछले आठ महीने में अपने न्यूनतम स्तर पर है। जाहिर है, बाजार में मांग नहीं है। बेरोजगारी जिस रफ्तार से बढ़ रही है और मंदी के कारण लोगों की नौकरियां जा रही हैं, उस सूरत में पैसा आएगा कहां से खर्च करने के लिए, यह बड़ा सवाल है। जिनके पास थोड़ा-बहुत पैसा है भी, वे आर्थिक संकट को देखते हुए उसे भविष्य के लिए बचा कर रखे हुए हैं, खर्च करने से डर रहे हैं। इसलिए बाजार में नगदी का संकट बन गया है।

रिजर्व बैंक पहले ही कह चुका है कि वह जरूरत को देखते हुए नीतिगत दरों में और कटौती कर सकता है। केंद्रीय बैंक इस साल पांच बार नीतिगत दरों में बदलाव कर चुका है, जो पिछले नौ साल के न्यूनतम स्तर पर जा चुकी है। इस कवायद का सारा जोर बाजार में मांग पैदा करना है, ताकि लोग खरीदारी के लिए पैसा निकालें। हाल में केंद्रीय कर्मचारियों का महंगाई भत्ता पांच फीसद बढ़ाने के पीछे भी यही बड़ी वजह रही। लेकिन सवाल यह है कि क्या केंद्रीय बैंक के पास नीतिगत दरों में कटौती के अलावा कोई और चारा नहीं रह गया है। इस वक्त अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता को लेकर लोगों के मन में जो डर पैदा हो गया है, उसे निकालने की जरूरत है। बैंक भी कर्ज देने में डरे हुए हैं, इसलिए तमाम कोशिशों के बावजूद कर्ज लेने वालों का आंकड़ा बढ़ नहीं रहा। सरकार ने कारपोरेट करों में कटौती जैसे कदम तो उठाए हैं, लेकिन उससे आम आदमी को क्या फायदा होगा? जरूरत है मध्यमवर्ग की आमद बढ़ाने के लिए कदम उठाए जाएं, उस पर से करों का बोझ हल्का किया जाए, ताकि लोगों के हाथ में पैसा आए।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 संपादकीय: हिंसा की सियासत
2 संपादकीयः एक और कदम
3 संपादकीयः अनियमितता के कोष